Wednesday, January 27, 2016

आइडिया ऑफ इंडिया - शिव विश्वनाथन

पहले यह समझ लें कि आइडिया ऑफ इंडिया है क्या

- शिव विश्वनाथन, प्रख्यात समाजशास्त्री


आइडिया आॅफ इंडिया यानी भारत की संकल्पना की उत्कृष्ट अवधारणा को लेकर हमारे राष्ट्र-निर्माताओं ने बहुत सारे विचार दिये हैं, जिन पर समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं। इसी के मद्देनजर इस गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर मैंने बात की राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक केएन गोविंदाचार्य जी से कि उनकी नजर में आइडिया ऑफ इंडिया का अर्थ क्या है। 
Shiv Visvanathan

मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में आइडिया ऑफ इंडिया यानी भारत की संकल्पना की अवधारणा को कैसे देखते हैं आप?
आइडिया ऑफ इंडिया को सही-सही व्यक्त करने में कई तरह के सवाल हमारे सामने खड़े हो जाते हैं, जिनके जवाब भी पूरी तरह से खरे नहीं होते, बल्कि संदेहों से भरे होते हैं। पहला सवाल तो यही है कि क्या भारत एक सभ्यता है, या एक राष्ट्र-राज्य (नेशन स्टेट) है? अगर हम भारत को राष्ट्र-राज्य की संज्ञा देते हैं, जो कि देते ही हैं, तो देशभर में सुरक्षा, विकास और आधुनिकता की दरकार ज्यादा तेजी से बढ़ती है, लेकिन उसके साथ ही सभ्यतागत मूल्यों का क्षरण होता जाता है और नागरिक मूल्यों में कमी आती जाती है। जाहिर है, जब मानव सभ्यता और नागरिक मूल्यों में कमी आयेगी, तो फिर आइडिया ऑफ इंडिया का स्वरूप विकृत तो होगा ही। इसके बाद आप इस विचार की चाहे जितनी भी परिभाषाएं दे दें, उसमें कहीं न कहीं एक संदेह तो बना ही रहेगा कि वास्त्व में आइडिया ऑफ इंडिया है क्या! मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि राष्ट्र-राज्य हिंसा का बहुत बड़ा स्रोत है। ऐसा नहीं कि यह हिंसा देश के नागरिकों को बेझिझक जान से मारने की ही हिंसा है, बल्कि यह हिंसा विकास के रास्ते में आनेवाली चीजों को हटानेवाली होती है। मसलन, देशभर में अपने विकास मॉडल के तहत हमने 40 मिलियन लोगों को उनकी जड़ों से विस्थापित कर दिया है। किसी को उनकी जड़ों से काट देना भी एक प्रकार की हिंसा है, प्रताड़ना है, जो राष्ट्र-राज्य बाकायदा सुनियोजित तरीके से अपने सरकारी एजेंडे के तहत करता है। दंगों से 10 मिलियन लोगों को हमने विस्थापित किया है। ऐसे और भी उदाहरण हैं। कश्मीर और पुर्वोत्तर के राज्य तो हमेशा ही राष्ट्र-राज्य की सरकारी हिंसा के शिकार रहे हैं। ऐसे में हम लोग किस आइडिया ऑफ इंडिया की बात करते हैं, यह समझना बहुत मुश्किल है। 

मौजूदा दौर में देश में जो व्यवस्थाएं हैं, क्या वे भारत की संकल्पना को पूरा करने में सार्थक हैं या फिर उनमें कुछ सुधार किये जाने की जरूरत है? 
देश की कुछ व्यवस्थाओं पर बात करते हैं। देशभर में जिस तरह से तमाम व्यवस्थाएं विकृत होती जा रही हैं, उस पर हमें फिर से शुरू से विचार करने की जरूरत है। गरीब और गरीबतर तो छोड़िए, निचले मध्यवर्ग के लोगों तक दवाओं की उपलब्धता नहीं है हमारे देश में। पारिस्थितिकी का हाल बहुत ही खराब है और हम नये-नये तरह के पर्यावरणीय खतरों से लड़ रहे हैं। प्राकृतिक संसाधनों का बेतहाशा दोहन और विध्वंस सोने की चिड़िया कहे जानेवाले भारत को मिट्टी की चिड़िया बनाने पर तुले हुए हैं। न्याय व्यवस्था, प्रशासनिक व्यवस्था, राजनीतिक व्यवस्था और सबसे बढ़ कर हमारी सामाजिक व्यवस्था, इन सब में इतनी खामियां आ गयी हैं कि यह समझ पाना बहुत मुश्किल है कि वास्तविक आइडिया आॅफ इंडिया की परिभाषा आखिर क्या है!

विज्ञान और तकनीक ने आइडिया आॅफ इंडिया को किस तरह से प्रभावित किया है? 
एक दौर था, जब बेंगलुरू साइंस सिटी के रूप में जाना जाता था, लेकिन कुछ नवोन्मेषी लोगों ने टेक्नोलॉजी पर इतना जोर दिया कि अब वहां सिर्फ टेक्नोलाॅजी की ही बात हो रही है। यही हाल कमोबेश पूरे देश का भी है। साइंस के जो सांस्कृतिक मूल्य (कल्चरल वैल्यू) थे, वे अब ना के बराबर हो गये हैं। टेक्नोलॉजी हम पर इस कदर हावी हो गयी है कि हम साइंस आधारित शोधों से दूर होते जा रहे हैं। क्योंकि, देश में ही नहीं, पूरी दुनिया में मौजूदा टेक्नोलॉजी का जो मॉडल है, वह ज्ञान बढ़ानेवाला मॉडल नहीं है, बल्कि पूरी तरह से पैसा वसूलनेवाला माॅडल है। पैसा वसूलनेवाले मॉडल से हम आइडिया आॅफ इंडिया के ज्ञान आधारित विचार को कैसे पूरा कर सकते हैं, इस पर मुझे संदेह है। सरकारें कहती हैं कि भारत आनेवाले दिनों में सुपर पॉवर बनेगा और सबसे बड़ा उपभोक्ता वर्ग वाला अर्थव्यवस्था बनेगा। अब सोचिए, जिस दिन भारत ऐसा बन जायेगा, उस दिन देश का कोई भी प्राकृतिक संसाधन बचेगा क्या, बिल्कुल नहीं, क्योंकि सबका दोहन करके हम उन्हें खत्म कर देंगे। दरअसल, हमारी सरकारों के पास भविष्य के भारत को लेकर कोई सोच ही नहीं है, अगर है भी तो वह दूसरे भौतिकवादी देशों का अनुसरण करनेवाली सोच है। जब बेहतर भारत बनाने की सोच ही नहीं है, तो फिर हम क्या उम्मीद करें कि आइडिया ऑफ इंडिया की हमारी अवधारणा कभी सार्थक हो पायेगी?  

देश के प्रमुख राष्ट्र-निर्माताओं ने अपने सपनों के भारत के बारे में जो बातें कही थी, बाद के सालों में भारत की दशा-दिशा उस पर कितनी खरी उतरती है?
हमारे भारत निर्माताओं ने आइडिया ऑफ इंडिया को लेकर जो सपने देखे थे, उनमें से किसी का भी सपना पूरा नहीं हो पाया है, न आगे पूरा होने की कोई संभावना नजर आ रही है, क्योंकि इस सपने को पूरा करने के लिए हमने सारे रास्ते गलत चुने हैं। देश की वास्तविक लोकतांत्रिक व्यवस्था यहां के नागरिकों में समानता वाली व्यवस्था होनी चाहिए। लेकिन, बहुसंख्यकवादी लोकतंत्र हमारे मूल लोकतंत्र में एक प्रकार का भय पैदा कर रहा है, जिससे असमानता बढ़ रही है। चुनावी लोकतंत्र में जिसको ज्यादा वोट मिलेंगे, वही सत्ता संभालेगा। यह ऐसा तत्व है, जो सिर्फ बहुमत को ही अपना सबकुछ मानता है और अल्पमत के साथ भेदभाव की स्थिति पैदा करता है। यही कारण है कि देश का मौजूदा बहुसंख्यकवाद एकरूपता (यूनीफॉर्मिटी) के पैमाने पर चल रहा है, बहुरूपता (डाइवर्सिटी) के पैमाने पर नहीं। और यही वह तत्व है, जो समाज को ऊंच-नीच में बांटता है और निचले तबकों में एक डर पैदा करता है। यह बड़ी ही तकलीफदेह बात है कि हम एक बड़े लोकतंत्र होते हुए भी हमारे यहां लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप नजर नहीं आ रहा है।

आर्थिक तौर पर आइडिया ऑफ इंडिया की अवधारणा के क्या मायने हैं? 
देश के नेता फॉर्मल इकोनॉमी (आधिकारिक अर्थव्यवस्था) को मजबूत करने में लगे हुए हैं, लेकिन वहीं इनफाॅर्मल इकोनॉमी (अनाधिकारिक अर्थव्यवस्था) देश के सत्तर प्रतिशत लोगों के बीच है। अब कृषि को ही लीजिए, कृषि की हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है, जबकि देश का एक बड़ा हिस्सा इस पर निर्भर है। कृषि को सुधारने के लिए नीति-निर्माताओं के पास कोई व्यवस्था नहीं है, जिसका खामियाजा किसानों की आत्महत्याओं के रूप में हम भुगत रहे हैं। देश की आधी से ज्यादा आबादी कई तरह की परेशानियों से जूझ रही हो, वहां आइडिया आॅफ इंडिया की अवधारणा के क्या मायने? 

संविधान के मुताबिक, सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय मिलेगा। क्या हमारा देश अपने नागरिकों से किये इस वादे को कितना पूरा कर सका है?
एक भारतीय नागरिक के लिए हमारे संविधान की प्रस्तावना में जिन अधिकारों की बातें कही गयी हैं, उस आधार पर हम यही पाते हैं कि देश में जन्मे सत्तर प्रतिशत लोग भारत के नागरिक ही नहीं हैं। एक आम भारतीय को भारत का नागरिक बनने के लिए घूस देना पड़ता है। क्या यह विडंबना नहीं है कि एक आम भारतीय संविधान द्वारा प्राप्त अपने मूल अधिकारों को पाने के लिए नौकरशाही को पैसे खिलाये? जहां अपने अधिकारों के लिए आपको पैसे चुकाने पड़े, वहां आइडिया आॅफ इंडिया की बात करना, मेरे ख्याल में यह मन बहलानेवाली बात होगी।
       कुल मिला कर देखें, तो साइंस और टेक्नोलॉजी में समस्याग्रस्त है, ऊर्जा की व्यवस्था समस्याग्रस्त है, पारिस्थितिकी और पर्यावरण की व्यवस्था समस्याग्रस्त है, स्वास्थ्य व्यवस्था समस्याग्रस्त है, शिक्षा व्यवस्था समस्याग्रस्त है, राष्ट्र-राज्य समस्याग्रस्त है, और सबसे बढ़ कर लोकतांत्रिक व्यवस्था समस्याग्रस्त है। ऐसे में आइडिया ऑफ इंडिया की अवधारण तभी सार्थक हो सकती है, जब इन समस्याग्रस्त व्यवस्थाओं को सही किया जाये। 

आइडिया ऑफ इंडिया - के एन गोविंदाचार्य

स्वाॅट एनालिसिस से ही तय होगी देश की दिशा

- केएन गोविंदाचार्य, राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक
K N Govindacharya

आइडिया आॅफ इंडिया यानी भारत की संकल्पना की उत्कृष्ट अवधारणा को लेकर हमारे राष्ट्र-निर्माताओं ने बहुत सारे विचार दिये हैं, जिन पर समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं। इसी के मद्देनजर इस गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर मैंने बात की राजनीतिक-सामाजिक विश्लेषक केएन गोविंदाचार्य जी से कि उनकी नजर में आइडिया ऑफ इंडिया का अर्थ क्या है। 

आजादी के इतने साल बाद प्रमुख राष्ट्र निर्माताओं के आइडिया ऑफ इंडिया की प्रासंगिकता को आप कैसे देखते हैं? 
आजादी के पहले जो लोग अलग-अलग धाराओं में आजादी के लिए काम कर रहे थे, आजादी के बाद के भारत या भारतीय समाज के बारे में उनकी धारणाएं और अभिमत थोड़े अलग-अलग थे। जैसे आजादी के आंदोलन की चार मुख्य धाराएं थीं- एक है महात्मा गांधी, दूसरे हैं भगत सिंह, तीसरे हैं वीर सावरकर और चौथे हैं नेताजी सुभाषचंद्र बोस। इन चार धाराओं के अंतर्गत आंदोलन में कुछ लोग साथ भी हो रहे थे, जैसे जवाहरलाल नेहरू जी महात्मा गांधी के साथ थे। अंगरेजों के भारत से वापस जाने के बारे में तो गांधी-नेहरू में सहमति थी, लेकिन अंगरेजों के जाने के बाद के भारत की तस्वीर के बारे में दोनों में बहुत गहरे मतभेद थे। उसी तरह से आजादी के बाद के भारत को लेकर डॉ भीमराव आंबेडकर जी और महामना मालवीय जी, इन दोनों की सोच में भी फर्क था। इसलिए जब हम आज आइडिया ऑफ इंडिया की बात करते हैं, तो मैं मानता हूं कि मूल द्वंद्व यह है कि हम भारत के हजारों साल के इतिहास को अपने चिंतन में समाहित करके चलना चाहते हैं या हम यह मानते हैं कि भारत एक नया राष्ट्र या बनता हुआ राष्ट्र या बहुत से राष्ट्रों का मिला कर राज्य (स्टेट) होगा, इससे हम क्या समझते हैं, इसी विचार से भारत का नक्शा तय होना है। और इन्हीं चार धाराओं में अलग-अलग प्रयास चल रहे हैं और कई बार सामाजिक एकता और एकात्मकता के रास्ते में परस्पर विरोधी स्वर भी दिखते हैं। इसी कारण जो भारतीय मानस में सर्वपंथ समादर का पहलू है, वह सेक्यूलरिज्म के संदर्भ और अर्थों से भिन्न है। सेक्यूलरिज्म शब्द एक विशिष्ट कालखंड में यूरोपीय इतिहास में जन्मा हुआ शब्द है। भारत के संविधान में गहरे आपातकाल के दौरान इस शब्द को लादा गया और थोपा गया। उस समय लोकतंत्र की स्थितियां ही नहीं थीं, जब संविधान में इस शब्द का समायोजन हुआ। इसलिए भारतीय संदर्भ में पंथनिरपेक्षता राज्य रखे और समाज में सभी मतों का समादर हो, ऐसा होना चाहिए। बाद में चल के इसी की अलग-अलग धाराएं बन गयीं, जिस पर विचार होना चाहिए। 

देश के प्रमुख राष्ट्र-निर्माताओं ने अपने सपनों के भारत के बारे में जो बातें कही थी, बाद के सालों में भारत की दशा-दिशा उस पर कितनी खरी उतरती है? 
स्वाराज्य की लड़ाई में अंगरेजों के जाने के बाद राज चलानेवाले लोग अपना रास्ता भटक गये। गांधी जी ने कारीगरी, किसान और गाय काे भारतीय समाज का संश्लेषित स्वरूप देखा था। ढाई सौ वर्षों से पहले कारीगरी को किसानी से काट कर अलग किया गया और किसानी को गाय से अलग कर दिया गया। इसी अलगाव के चलते कारीगरी, किसान और गाय तीनों अलग-अलग नुकसान में रहे। गांधी जी तीनों को जोड़ कर ही चल रहे थे। आजादी के बाद के नेता भारत को पहले रूस बनाने में लग गये और फिर बाद में कुछ लोग भारत को चीन बनाने में भी लग गये। उसके बाद भी नहीं रुके और कुछ लोग भारत को अमेरिका बनाने में जुट गये। अब हाल-फिलहाल में राजीव गांधी की नकल की कोशिश हो रही है। यह देश के आम आदमी और अंतिम आदमी के हितों पर कुठाराघात था। रूस की चमक-दमक के शिकार सत्ताधीशों ने बेतहाशा औद्योकिरण और सरकारीकरण को बढ़ावा दिया। फलत: सत्ता द्वारा पोषित उद्योगपति देश में खड़े हुए और व्यवस्था में नौकरशाही हावी हो गयी। लाइसेंस परमिट कोटा राज हो गया। उससे एकदम से राह बदले, तो वे अमेरिका की तरफ मुड़ गये। तब यह राजीव गांधी का दौर था। तब से अब तक वही बात चल रही है। हाल-फिलहाल में लगा कि भारत का आदर्श ब्राजील हो सकता है, यह बिना जाने-समझे कि ब्राजील की जनसंख्या-भोग्य अनुपात भारत से बिल्कुल भिन्न है। 

आज के राजनेता आइडिया ऑफ इंडिया से कितने अलग हैं? 
भारत की आत्मा गांव में बसती है, यह तो कहा गया, लेकिन शहरीकरण अब तक देश के नब्बे हजार गांवों को लील चुका है। अब स्मार्टसिटी की घोषणा भी हो चुकी है। एक स्मार्टसिटी तकरीबन सात सौ गांवों को खत्म करेगी और देश में सौ स्मार्टसिटी की कल्पना की गयी है। ऐसे में सोचिए कि इस शहरीकरण के चलते कितने गांव खत्म हो जायेंगे। 

क्या मौजूदा विकास नीति या आधुनिकीकरण आइडिया ऑफ इंडिया पर खरे उतरते हैं?
गांधी जी अनारक्षित डिब्बे के यात्रियों का दुख-दर्द जानते थे। आज हमारे सत्ताधीशों ने प्राथमिकता बदल दी है और उनका लक्ष्य अब बुलैट ट्रेन हो गया है। जबकि, बुलैट ट्रेन के किराये के बराबर ही वायुयान का किराया पड़ेगा। बुलैट ट्रेन चलाने की प्रक्रिया में जमीन-जल-जंगल जैसे प्राकृतिक संसाधनों की कीमत पर इस नये विकास की कोशिश हो रही है, जो हमारे देश के लिए निहायत ही आत्मघाती कदम है। इसमें विगत साठ वर्षों में बढ़ी बेरोजगारी, प्रकृति विध्वंस, गैर-बराबरी, महंगाई आदि इस बात का सबूत है कि आजादी के आंदोलन के लक्ष्य और मूल्यों से देश के सत्ताधीश भटकते गये और उनका राष्ट्रीय सरोकार कटता गया है। 

संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि भारत में विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता होगी। वर्तमान में इनकी स्थिति कैसी है?
भारत को अगर हम हजारों साल की परंपरा का देश तो मानेंगे, लेकिन केवल पिछले हजार साल के दौरान जो परंपराएं विकसित हुईं, उनको नहीं मानेंगे, तो फिर भारत की तस्वीर ही बदल जायेगी। दुर्भाग्य से देशभक्ति के तत्व को सांप्रदायिकता कहा जा रहा है और अल्पसंख्यकवाद को सेक्यूलरिज्म कहा जा रहा है। मेरे ख्याल में यह समझ की विडंबना है और पूरी तरह से विरोधाभासी समझ है। 

संविधान के मुताबिक, सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय मिलेगा। क्या हमारा देश अपने नागरिकों से किये इस वादे को कितना पूरा कर सका है?
जहां तक न्याय-व्यवस्था का सवाल है, तो इसका अर्थ यह है कि इस व्यवस्था में जनता को पहले भरोसा मिले। देशभर में जिस तरह से तीन करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं, उससे कोई भरोसा मिलता तो नहीं दिख रहा है। हमारे देश में जनसंख्या और जजों का अनुपात बहुत खराब है। मौजूदा भारत की दस लाख आबादी पर साढ़े बारह जज हैं, जबकि अमेरिका में दस लाख आबादी पर 113 जज हैं। न्यायपालिका ने कहा था कि केंद्रीय सरकार अगर सात हजार करोड़ रुपये दे, तो हम दस लाख जनसंख्या पर 50 जजों को बहाल कर पायेंगे। तब जाकर ये तीन करोड़ लंबित मुकदमे चार साल में निपट पायेंगे। लेकिन केंद्रीय सरकार ने न्यायपालिका को यह पैसा नहीं दिया। आइडिया आॅफ इंडिया के मद्देनजर, इससे स्पष्ट होता है कि सरकारों की प्राथमिकता क्या रही है। 

आखिरी सवाल, आइडिया ऑफ इंडिया आपकी नजर में?
आइडिया आॅफ इंडिया इस बात से तय होगा कि हम इंडिया यानी भारत से क्या समझते हैं। भारत का स्वॉट एनालिसिस (SWOT- strengths, weaknesses, opportunities and threats यानी शक्तियां, कमजोरियां, अवसर अौर खतरों) का विश्लेषण बहुत दोषपूर्ण है। अगर हम इन चारों का अच्छी तरह से विश्लेषण कर लेते, या आज भी कर लें, तो हमारे देश की दशा-दिशा सही से तय हो सकती है। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो आगे देश में विषमता, अराजकता के लिए निमंत्रण रहेगा ही और इससे देश का राजनीतिक ढांचे पर बेतहाशा तनाव बढ़ेगा। 

Friday, January 15, 2016

एक कवि के ‘मैं’ का ‘तुम’ हो जाना

   
स्त्री अस्मिता को लेकर भारत में शुरू हुए स्त्रीवादी आंदोलनों और महिला अधिकारों की
बहसों की शुरुआत के बाद से स्त्रीवादी कविता में उसके सरोकारों की भी बात होने लगी। हालांकि, उसके पहले भी स्त्रीवादी कविताएं लिखी जाती थीं, लेकिन तब उसमें स्त्री अधिकारों और सरोकारों की बातें कम होती थीं, स्त्री सौंदर्य और स्त्री प्रेम की बातें ज्यादा होती थीं। सामाजिक स्तर पर स्त्री अस्मिता के संघर्ष ने स्त्रीवादी लेखन की धार को और तेज किया, जिसके रास्ते से होकर खुद सामाजिक चेतना भी और मुखर हुई। यही वजह है कि समाज और राजनीति पर बात कहने के लिए अशोक कुमार पाण्डेय ने भी स्त्री संवेदनाओं का ही सहारा लिया और नाॅस्टेल्जिया में पहुंचकर कहने पर मजबूर हुए कि ‘मां कमजोर नहीं थी, बनायी गयी थी, मां की कमजोरी हम सबकी सुविधा थी।’ एक अरसा पहले तक एक स्त्री परिवार को चलाने और उसे संस्कारित करने के लिए जानी जाती थी, लेकिन अब मौजूदा स्त्रीवादिता का तकाजा उस पर अफसोस करता है कि काश बीते पैंतीस सालों से घर के सबसे उपेक्षित कोने में मथढक्की साड़ी के नीचे मां की डिग्रियों का पुलिंदा दबा न पड़ा होता, तो शायद मंजर ही कुछ और होता। मां रोटियों पर हस्ताक्षर करने के बजाय काॅलेज के रजिस्टर पर हस्ताक्षर कर रही होतीं और पिता बिल्कुल भी न रोकते। मगर एक मां सिर्फ मां होती तो शायद वह सब कुछ कर जाती, लेकिन वह एक स्त्री है, जिसकी प्राथमिकता में उसका परिवार हो जाता है। आखिर इस प्राथमिकता का भान सिर्फ उसे ही क्यों है? किसने कहा कि वह अपनी प्राथमिकता तय कर ले? जाहिर है, एक स्त्री ने खुद तय नहीं किया होगा, बल्कि पुरुष सत्तात्मक सामाजिक-राजनीतिक संरचना के चलते वह ऐसा करने के लिए मजबूर हुई होगी। कवि ने स्त्री की इस मजबूरी को बखूबी पहचाना और उसके जीवनपर्यंत चलने वाले संघर्षों की हर उस संवेदना को अपनी कविता में पिरो कर उसे संबल दिया है। आउटलुक का लिंक यहां देखें-  http://www.outlookhindi.com/art-and-culture/review/book-review-by-vasim-akram-5912
शब्दारंभ प्रकाशन से प्रकाशित युवा कवि और लेखक अशोक कुमार पाण्डेय की स्त्रीवादी कविताओं का यह ताजा संग्रह ‘प्रतीक्षा का रंग सांवला’ अशोक को कविता का नवल पुरुष बनाता है। ‘सिंदूर बनकर तुम्हारे सिर पर, सवार नहीं होना चाहता हूं, न डस लेना चाहता हूं, तुम्हारे कदमों की उड़ान को..., यह कवि का ऐसा एहसास से भरा बयान है, जो स्त्री अस्मिता के संघर्षों में उसका साथी बनता है और ऐसा विश्वास दिलाता है कि वह रिश्तों को बंधन की तरह नहीं, बल्कि स्वच्छंदता के रूप में स्वीकार करता है। पुरुष सत्तात्मक हमारे समाज की यह विडम्बना है कि उसके पास ऐसा घर है जिसमें स्त्रियों के लिए बंधनों की चार दीवारें तो होती हैं, पर उनमें उन्मुक्तता की एक अदद खिड़की तक नहीं होती। उन दीवारों में खिड़कियां बनाती अशोक की कविताओं में स्त्री जीवन का हर वह पहलू विद्यमान है, जो अस्मिताओं और आंदोलनों की बुनियाद है। 
इस संग्रह की ज्यादातर कविताओं में ग्राम्य जीवन की प्रतीक्षारत नाॅस्टेल्जिया है, जिसका रंग जाहिर है सांवला ही होना चाहिए और है भी। यह कवि के ग्रामीण आग्रहों का अपना रचा-बसा संसार है, जिसमें वह बांस की डलिया को प्लास्टिक की प्लेटों और रस-भूजा को चाय-नमकीन में बदलते देखता है। हमारे शहरी जीवन की भागदौड़ भरी जिंदगी इतनी तेजी से बदल रही है कि उसे थामना मुश्किल होता जा रहा है। लेकिन स्मृतियां इतनी शक्तिशाली होती हैं कि वे उन्हें थामे रखती हैं, और हम शहर में फ्लैट की बाॅल्कनी में बैठे-बैठे ही अपने गांव के खेत में हो रही बारिश का आनंद लेने लगते हैं। 
ऐसा लगता है कि कवि अनवरत एक तलाश में है। पारिवारिक उलझनों के बीच स्त्री प्रेम में पगी उस संवेदना के वजूद की तलाश, जो कविता रचती है। जहां तलाश खत्म हुई, कविता मर गयी, कवि मर गया। प्रेम कभी पूरा नहीं होता, और जब पूरा होता है, आमदी मर जाता है। किसी चीज का पूरा होना उसका खत्म होना है, जैसे जिंदगी का पूरा होना मौत को पा लेना है। इस तलाश में कवि खुद के वजूद को कहीं खो देता है, या यूं कहें कि उसके ‘मैं’ का ‘तुम’ हो जाता है- ‘तुम्हारी तरह होना चाहता हूं मैं, तुम्हारी भाषा में तुमसे बात करना चाहता हूं, तुम्हारी तरह स्पर्श करना चाहता हूं तुम्हें, तुम होकर पढ़ना चाहता हूं सारी किताबें, तुम्हें महसूसना चाहता हूं तुम्हारी तरह...’ खुद का वजूद खत्म कर तुम हो जाना बड़ा कठिन है इस दौर में। इस तरह तो पुरुष सत्ता की अट्टालिकाएं भरभरा कर गिर जायेंगी, लेकिन यह काम स्त्रीवादी कविताएं ही कर सकती हैं। स्त्री केंद्रित कविता का वाहक कवि ही कर सकता है। अशोक कुमार पाण्डेय कर सकते हैं।
अशोक की कुछ कविताएं कहीं-कहीं अपने पद्यामत्मकता से भटक कर गद्यात्मकता की ओर चली जाती हैं। ऐसा लगता है कि कवि के ख्याल अपनी पुख्तगी को पाने के लिए भागे चले जाते हैं। छोटी-छोटी बहर की जगह बड़े वाक्यों जैसी शैली में उभार लेती ये कविताएं कवि की संवेदनाओं को एक बड़ा फलक मुहैया कराती हैं। ‘पंखुड़ियां नोचकर गुलाब को कली में बदलती उस लड़की की आंखों में कोई कली नहीं थी, नुची हुई पंखुड़ियों की खामोशी थी... उसे प्रेम का नहीं प्रेमियों का इंतजार है जिनके लिए उसने नोची हैं दिन भर पंखुड़ियां...’ 
जिसने राह पूरी कर ली, जिसे मंजिल मिल गयी, उसका सफर तो खत्म हुआ। उसे फिर कहीं जाने की जरूरत नहीं। जीवन खत्म। संवेदना खत्म। कविता खत्म। लेकिन वहीं, अगर ‘जिन्हें जीवन की राहें पता हों ठीक-ठीक, उन्हें प्रेम की कोई राह पता नहीं होती...’ प्रेम के इस पता न होने की तलाश है, जो कवि में जिंदा है और वह आगे बढ़ने की कोशिश में बार-बार पीछे लौट आता है। लौटना तो पड़ेगा ही। जीने के लिए और, और भी प्रेम करने के लिए। 

Thursday, December 10, 2015

श्रद्धांजलि : एक विद्रोही जनकवि का जाना

- कृष्ण प्रताप सिंह
       ‘तुम/वे सारे लोग/ मिलकर मुझे बचाओ/ जिनके खून के गारे से/ पिरामिड बने, मीनारें बनीं, दीवारें बनीं.../तुम मुझे बचाओ!/ मैं तुम्हारा कवि हूं।’ 
Ramashankar Yadav 'Vidrohi'
        पिछले कई दशकों से प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी जेएनयू समेत देश के अनेक विश्वविद्यालयों के परिसरों के अन्दर और बाहर यह गुहार लगाते आ रहे जनकवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ ने गत आठ दिसम्बर को शाम साढ़े चार बजे अंतिम सांस ली, तो हिन्दी ने अपनी वाचिक परम्परा और प्रगतिशील वाम चेतना का अब तक का अन्तिम विद्रोही जनकवि खो दिया। जनकवि, जो इस अपवंचित राष्ट्र के हलवाहों-चरवाहाें, केवट-कहारों, किसान-मजदूरों, दलितों-वंचितों, स्त्रियों और बच्चों को साथ लेकर उनकी यातनाओं, सपनों व भविष्य के प्रश्नों के समाधान के लिए तमाम पंडों-पुरोहितों, मुल्ला-मौलवियों, महाजनों-जमीन्दारों और पूंजीपतियों-साम्राज्यवादियों से लड़ता व ‘अपहृत अतीत’ का हिसाब मांगता था। जनकवि, जिसे पहले भी कुछ कम नहीं मारा गया। ‘अनेक बार घोषित किया गया/ राष्ट्रीय अखबारों में, पत्रिकाओं में/कथाओं में, कहानियों में/कि विद्रोही मर गया’, लेकिन वह जिन्दा रहा और गाता रहा। जनकवि, जिसके लिए कविता बाप के सूद और मां की रोटी के अलावा बेटा-बेटी और खेती थी। जनकवि, जो आसमान में धान जमाना और भगवानों को धरती से उखाड़ना चाहता था। जनकवि, जिसकी कविताओं में पितृसत्ता, धर्मसत्ता और राजसत्ता के हर छद्म व पाखंड के खिलाफ अपरम्पार गुस्सा व बेहद तीखी घृणा है। जनकवि, जिसके शब्द हर उस आततायी/शोषक को तिलमिला कर रख देते हैं, जिसे अपनी बदमाशियां छिपाने के लिए संस्कृति की पोशाक चाहिए। जनकवि, जिसे अपने लिए कोई फंड, प्रकाशन, पुरस्कार, रोजगार, किसी सरकार की नजरेइनायत या साहित्यिक प्रमोटर नहीं चाहिए था। 
          जनकवि, जो अपने छंदों व लय की तरह ही मुक्त था, कविताएं लिखता नहीं, कहता, गाता था और जिसने अपनी कविताएं कभी खुद कागज पर नहीं उतारीं। भले ही इस कारण उसकी ढेरों अवधी कविताएं उसके जाने के साथ ही हमेशा के लिए खो गयीं और स्नेही मित्र उसकी सैकड़ों रचनाओं में से कुछ को ही लिपिब़द्ध कर ‘नयी खेती’ नाम के संग्रह में प्रकाशित कर पाये। जनकवि, जो आन्दोलनों व प्रतिवाद सभाओं में कविताएं सुनाकर बच्चों की तरह खुश होता था और इस खुशी को ही अपना एकमात्र पुरस्कार बताता था। जनकवि, जो नाजिम हिकमत, पाब्लो नेरुदा, कबीर और अदम गोंडवी की परम्परा से आता और जेएनयू से बाहर की दुनिया के लिए लगभग अलक्षित था। जनकवि, जो आधुनिक सभ्यता की सारी विडम्बनाएं झेलकर भी फक्कड़ व मलंग बना फिरता था। जनकवि, जो जेएनयू में गया तो अपनी पढ़ाई अपनी पढ़ाई पूरी करने था, लेकिन अपनी विद्रोही प्रतिभा से बौद्धिक बौनेपन व निठल्लेपन के शिकार प्राध्यापकों से कोसों आगे निकलकर वंचितों-शोषितों से एकजुटता के मामले में तमाम डिग्रीधारी ‘किताबी कीड़ों’ को शर्मिन्दा कर गया! जनकवि, जिससे मिलना एक परम्परा से मिलना था और जिसमें जेएनयू कैम्पस के दशकों पुराने आन्दोलनों व पड़ावों के कितने ही किस्से निरंतरता पाते थे। जनकवि, जिसने अपना आखिरी दिन भी आन्दोलनरत रहकर बिताया। जनकवि, जो इस विचार से अपना जीवनरस प्राप्त करता था कि साम्राज्य आखिर साम्राज्य ही होता है, चाहे वह रोमन हो, ब्रिटिश या अत्याधुनिक अमेरिकी। 
Ramashankar Yadav 'Vidrohi'
         हिन्दी के वरिष्ठ आलोचक विजयबहादुर सिंह प्रायः कहते हैं कि इन दिनों हिन्दी में जो कुछ भी उल्लेखनीय हो रहा है, वह उसके विश्वविद्यालयों, संस्थानों व अकादमियों के बाहर हो रहा है। अगर उनके कहने का अर्थ यह है कि विश्वविद्यालयों, संस्थानों व अकादमियों में जड़ें जमाये ‘अहले खिरत’ अब हमें लगातार निराश कर रहे हैं तो इस जनकवि ने भी उन्हें सही सिद्ध किया, जिसे जेएनयू प्रशासन द्वारा जानबूझकर ‘बाहर’ कर दिया गया था!
          उसके लिए कविता जीविका नहीं, जिन्दगी थी। इसलिए वह उसी की मार्फत बोलता-बतियाता, रोता-गाता, संकल्प लेता, खुद को और सबको संबोधित करता, चिंतन करता, भाषण देता, गरियाता और बौराता था! उसने अपनी कविताओं की एक सर्वथा अलग, अगम व निराली दुनिया बना रखी थी, जिसमें ‘कलजुगहे मजूर’ पूरी सीर मांगा करते थे। जनकवि, जो चाहता था कि ‘भारतभाग्यविधाता’ और ‘जनगणमन अधिनायक’ समेत सारे बडे-बड़े लोग पहले मर लें, फिर वह मरे इत्मीनान से...और हां, जाते-जाते भी जिसने कबीर की तरह जस की तस धरि दीन्हीं चदरिया।   
             तीन दिसम्बर, 1957 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के ऐरी फिरोजपुर गांव में जन्मे करमा देवी व रामनारायण यादव के बेटे रमाशंकर यादव के विद्रोही जनकवि बनने की एक रोचक दास्तान है। बचपन में ही विवाह के बाद वह शांती देवी नामक बालिका का पति बन गया था। शांती पढ़ने जाती थी जबकि वह भैंसें चराता था। लोग मजाक उड़ाते थे कि उसका गौना होगा और शांती उसके घर आयेगी तो उसका अनपढ़ होना सह नहीं पायेगी और उसे छोड़कर चली जायेगी। क्या पता, शांती के छोड़ जाने का भय था या उसके प्रति जन्मा सहज मानवीय अनुराग, चरवाहे रमाशंकर ने पढ़ाई-लिखाई शुरू की तो पीछे मुड़कर नहीं देखा। बीए के बाद धनाभाव के कारण एलएलबी नहीं कर पाया, तो नौकरी कर ली। लेकिन पढ़ाई की तड़प 1980 में नौकरी छुड़वाकर उसे जेएनयू खींच लायी। उसे हिन्दी में एमए करना था, लेकिन जेएनयू के माहौल में रमा, तो तीस से ज्यादा वसंतों तक उसी का बना रहा। अलबत्ता, छात्र के नहीं, विद्रोही जनकवि के रूप में उसे कर्मस्थली बनाकर। उसके हास्टलों, पहाड़ियों और जंगलों में आय के किसी सुनिश्चित स्रोत के बगैर छात्रों के अयाचित सहयोग से गुजर करते हुए। 1983 में एक छात्र आन्दोलन में हिस्सेदारी के कारण उसे जेएनयू कैम्पस से निकाल दिया गया तो 1985 में उसपर मुकदमा चला। अगस्त, 2010 में जेएनयू प्रशासन ने कथित रूप से अभद्र व अपमानजनक भाषा के प्रयोग के आरोप में तीन वर्ष के लिए उसके कैम्पस प्रवेश पर पाबन्दी लगायी, तो वह जेएनयू के लगभग छात्रों के लिए मर्मांतक हो उठी थी। 
            काबिलेगौर यह कि इतने विघ्नों व बाधाओं के बावजूद यह विद्रोही अपना राह पर चला तो बस चलता ही गया। जेएनयू की वाम राजनीति की पक्षधर और संस्कृतिप्रेमी छात्रों की कई पीढ़ियां उसको उसकी ही शर्तों पर स्वीकार और प्यार करती रहीं। वह खुद भी छात्रों के हर न्यायपूर्ण आन्दोलन में तख्ती उठाये,नारे लगाता, कविताएं सुनाता सड़कों पर मार्च करता रहा। अनेक लोकतांत्रिक जुलूसों व प्रदर्शनों में उसकी आवाज दिल्ली की सड़कों पर, बैरिकेडों और पुलिस पिकेटों के सामने गूंजती रही। बाद में वह उत्तर प्रदेश, बिहार व छत्तीसगढ़ आदि के विश्वविद्यालयों के आयोजनों व आन्दोलनों में भी जाने लगा था। जहां भी जाता, प्रगतिशील सोच व सरोकारों वाले छात्र उसे हाथोंहाथ लेते। कई बार उसके कवितापाठ के दौरान अनेक रिक्शेवाले, खोमचे वाले और मजदूर स्वतःस्फूर्त ढंग से जुट जाते और तालियां बजाते। पटना के गांधी मैदान के समीप वाले चैराहे पर हुआ उसका ऐतिहासिक काव्यपाठ इसका सबसे बड़ा गवाह है।   
         नितिन ममनानी ने हिन्दी व भोजपुरी में ‘आई एम योर पोएट’ शीर्षक हिन्दी व भोजपुरी वृत्तचित्र बनाया तो मुम्बई के अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में उसे अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाश्रेणी में सर्वश्रेष्ठ वृत्तचित्र का पुरस्कार प्राप्त हुआ था।   
Ramashankar Yadav 'Vidrohi' in JNU Campus

Saturday, May 9, 2015

मां के हाथों की मस

चाहे जितनी भी ने’अमतें भर लूं
चाहे जितना सिकमसर हो लूं
निवाला पेट से आगे नहीं जा पाता कोई
और न पेट ही भरता है ख़ुद से खाने में

उम्र बढ़ने का ये ख़सारा है
कि बरकतें घटती गयी हैं दिन-ब-दिन
निवाले की बड़ी साइज़ भी अब
भूख की शिद्दत का पास नहीं रख पाती

मेरी ज़ुबां में ‘नामू-नामू’ कहते हुए
मां खिलाती थी जब बचपन में
तो जिस्म के सारे हिस्से
रोग़न हो जाया करते थे एक निवाले से

आखि़री निवाले के बाद जब कहती थी मां
चल उठ, खड़ा हो जा तो ज़रा
कि खाना हाथ-पांव तक चला जाये
तो हड्डियों को मेरी एक उम्र मिल जाती थी जैसे

मां के हाथों की मस थी कि हाथी-घोड़े तक के
सारे निवाले चट कर जाता था पल में
लेकिन अब तो, ख़ुद के निवाले भी नहीं खा पाता
और न पेट ही भरता है खुद से खाने में

        चाहे जितना सिकमसर हो लूं
        निवाला पेट से आगे नहीं जा पाता कोई...



Friday, May 8, 2015

मदर्स डे पर एक कविता

अंतिम जन के फरवरी अंक में छपी मेरी कविता

Sunday, March 22, 2015

राजनीतिक खेल

तुम अनाज उगाओगे
तुम्हे रोटी नहीं मिलेगी,
तुम ईंट-पत्थर जोड़ोगे
तुम्हें सड़क पर सोना होगा,
तुम कपड़े बुनोगे
और तुम नंगे रहोगे,
क्योंकि अब लोकतंत्र
अपनी परिभाषा बदल चुका है
लोकतंत्र में अब लोक
एक कोरी अवधारणा मात्र है,
सत्ता तुम्हारे हाथ में नहीं
पूंजी के हाथ में है
और पूंजी
नीराओं, राजाओ, कलमाडियों,
अदाणियों, अंबानियों और टाटाओं के हाथ में है,
तुम्हारी जबान, तुम्हारी मेहनत
तुम्हारी स्वतंत्रता, तुम्हारा अधिकार
सिर्फ संवैधानिक कागजों में है
हकीकत में नहीं,
तभी तो,
तुम्हारी चंद रुपये की चोरी
तुम्हें जेल पहुंचा देती है
मगर,
उनकी अरबों की हेराफेरी
महज एक
राजनीतिक खेल बनकर रह जाती है...

Friday, March 20, 2015

जश्न-ए-रेख़्ता : 14-15 March, IIC, New Delhi

Inauguration of Jashn-e-Rekhta
उर्दू शायरी से मुहब्बत का जश्न

किसी मुल्क को अगर बहुत ही नज़दीक और गहराई से जानना हो, वहां की अवाम के दिलों में मचलते जज़्बात से राब्ता कायम करना हो, उसकी सियासत, अदबी नफासत, दीनी रवायत और इल्मी नज़ाकत से रूबरू होना हो, तो सबसे पहले उसकी ज़बान को जानिए, समझिए और हो सके तो उसके लहजे़ में पूरी तरह से उतर जाइए। इस बात से सिर्फ हमीं नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम दानिशवर भी बड़ी ही शिद्दत से इत्तेफाक रखते हैं। कुछ तो ऐसे भी हैं जो सिर्फ इत्तेफाक ही नहीं रखते, बल्कि उससे बेपनाह मुहब्बत भी करते हैं। उन्हीं चंद मुहब्बत करने वाले लोगों में एक नाम संजीव सराफ का भी आता है, जिन्होंने नोएडा में रेख़्ता फाउंडेशन की नींव रखी और उर्दू ज़बान को शिद्दत से महसूस करने वालों के लिए https://rekhta.org/ नाम की वेबसाइट की बुनियाद डाली। खुद संजीव सराफ की ज़ुबां में- ‘‘रेख़्ता, मेरी उर्दू से मुहब्बत का एक हसीन-ओ-तरीन नज़राना है।’’

Inaugural speech of Sanjeev Saraf in Jashn-e-Rekhta
            कभी उर्दू और फारसी के उस्ताद शायर ‘मिर्ज़ा असदुल्लाह खां ग़ालिब’ ने मीर तकी मीर की एक ग़ज़ल को सुनकर कहा था ‘‘रेख़्ता के तुम ही उस्ताद नहीं ग़ालिब। कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था।।’’ ज़ाहिर है तब ग़ालिब ने मीर और उनकी शायरी की तारीफ की थी और यह शे’र कहा था, लेकिन आज संजीव सराफ को उनकी उर्दू शायरी से बेपनाह मुहब्बत के लिए कहा जा सकता है कि आज वे सचमुच में ‘रेख़्ता’ के उस्ताद हैं। संजीव सराफ ने बिना किसी मुनाफे के रेख़्ता वेबसाइट के ज़रिये उर्दू शायरी को तीन ज़बानों (उर्दू, देवनागरी और रोमन लिपियों में) में पेश कर न सिर्फ दुनिया भर में उर्दू के दायरे को बढ़ाया है, बल्कि नुक्ता और इज़ाफत के सही-सही इस्तेमाल के साथ बेहतरीन उर्दू बोलने और समझने को लेकर एक उम्दा पहचान भी बनायी है। संजीव सराफ यहीं नहीं रुके, बल्कि इसे और आगे ले जाने के लिए ‘जश्न-ए-रेख़्ता’ नाम से एक दोरोज़ा प्रोग्राम का ऐलान भी कर दिया, जो गुजिश्ता 14 और 15 मार्च को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (आइआइसी) में बहुत ही खूबसूरत अंदाज़ में अपने कामयाब अंजाम को पहुंचा।

Javed Akhtar and Rakshanda Jaleel in Jashn-e-Rekhta
            एक ज़माने में दिल्ली के मशहूर शायर ‘दाग़ देहलवी’ कहते हैं- ‘‘उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं दाग़। सारे जहां में धूम हमारी ज़बां की है।।’’ अरसा पहले यह शे’र हिंदुस्तान और उसकी एक मक़बूल ज़बान उर्दू की तर्जुमानी करता था, लेकिन गुजिश्ता वक्त के कुछ वक्फे में उर्दू पढ़ने और लिखने में आयी कमी से ऐसा महसूस होने लगा था कि शायद हमारी आगे आने वाली पीढ़ियां उर्दू ज़बान से महरूम रह जायें। इस मायूसी के आलम में रेख़्ता की शुरुआत और फिर जश्न-ए-रेख़्ता का एहतमाम इस बात की तस्दीक करता है कि हमारी आने वाली पीढ़ियां उर्दू ज़बान से मुहब्बत करती रहेंगी।

              दो दिन तक चले जश्न-ए-रेख़्ता के खूबसूरत अदबी माहौल में हिंदुस्तान और दूसरे ममालिक पाकिस्तान, अमेरिका और कनाडा से आये तकरीबन 60 से ज्यादा शायरों, फनकारों, गुलोकारों, दानिशवरों और अदबी शख्सियतों ने अपनी शिरकत से इंडिया इंटरनेशनल सेंटर को खुशरंग बना दिया था। प्रोग्राम के पहले दिन हिंदी फिल्मी दुनिया के मशहूर फिल्म लेखक, शायर और गीतकार जनाब जावेद अख़्तर से रख्शंदा जलील ने उर्दू शायरी के हवाले से खूब सारी गुफ्तगू की। उसके बाद ‘उर्दू और हिंदी: क़ुर्बतें और फासले’ मौजू पर हिंदी के अदीब अशोक बाजपेयी, सियासी दानिशवर पुरुषोत्तम अग्रवाल और उर्दू अदीब शमीम हनफी ने अपनी दिली बातों से वहां मौजूद लोगों के दिल-ओ-दिमाग पर बेहतरीन दस्तक दी। शमीम हनफी ने कहा कि उर्दू हो या हिंदी इन दोनों ज़बानों को सियासत और मज़हब से बचाने की ज़रूरत है। हनफी ने बयान फरमाया कि मुल्क की आज़ादी के बाद से ही उर्दू ज़बान का वजूद ख़तरे में रहा है, क्योंकि कुछ लोगों ने इसे सिर्फ मुसलमानों की ज़बान मान ली है। ज़ाहिर है कि उर्दू हो या हिंदी, ज़बानें किसी मख्सूस कौम या मज़हब की नहीं होती हैं, बल्कि वे तो पूरे मुल्क की तर्जुमानी करती हैं।

Shaam-e-Ghazal in Jashn-e-Rekhta
              शाम चार बजे ‘‘मुशायरे का बदलता रंग-रूप’’ में लोगों से रूबरू हुए एनडीटीवी के एंकर रवीश कुमार ने हिंदी कवि डाक्टर कुमार विश्वास, एहसासात की दुनिया के मशहूर शायर मुनव्वर राना और अमेरिका से आये सत्यपाल आनंद से अपने सहाफी अंदाज़ में ख़ूब गुफ्तगू की और लोगों को यह एहसास नहीं होने दिया कि वे जश्न-ए-रेख़्ता की डाइस पर हैं या फिर टीवी के परदे पर। अगले प्रोग्राम ‘‘उर्दू शायरी और तहज़ीब: एक ज़ाती तजुर्बा’’ में पाकिस्तानी अखबार डान के दिल्ली ब्यूरो के सहाफी सईद नकवी और ओबैद सिद्दीकी ने अपने-अपने तजुर्बात से लोगों को रूबरू कराया और फिर शाम सात बजे फिल्म गरम हवा की स्क्रीनिंग के बाद शाम नौ बजे ‘‘मुशायरा: बज़्म-ए-सुख़न’’ शुरू हुआ, जिसमें तशरीफ फरमां शायर थे- अमजद इस्लाम अमजद, अनवर शउर, अश्फाक़ हुसैन, फरहत एहसास, जावेद अख़्तर, मोहम्मद अल्वी, निदा फाज़ली और वसीम बरेलवी। इन सभी शायरों ने अपने शे’र-ओ-सुखन से ऐसा शमा बांधा कि जश्न-ए-रेख़्ता का मेयार इतनी उंचाई पर पहुंच गया, जहां से यही आवाज़ सुनायी दे रही थी कि ‘‘सारे जहां में धूम हमारी ज़बां की है...’’
                ‘‘उर्दू अदब की तानीसी आवाज़’’, ‘‘उर्दू-इनसानी वहदत की ज़बान’’, ‘‘इंटरनेट की दुनिया में उर्दू’’, ‘‘उर्दू में जासूसी अदब’’, ‘‘अख़्तरी: ए ट्रिब्यूट टू बेग़म अख़्तर’’ जैसे कई और खूबसूरत प्राग्रामों का हिस्सा बनने के लिए लोग बेक़रार नजर आ रहे थे और शायद यही वजह रही कि इंडिया इंटरनेशनल के आडीटोरियम, कान्फरेंस रूम, फाउंटेन लान्स और मल्टपरपज हाल की सभी सीटें भर चुकी थीं।
Ravish kumar and Munawar Rana in Jashn-e-Rekhta
               जश्न-ए-रेख़्ता के दूसरे दिन की शुरुआत ‘‘टेटवाल का कुत्ता’’ नाटक से हुई। और फिर ‘‘ग़ज़ल: अहद बा अहद’’, ‘‘फिल्मों की ज़बान उर्दू’’, ‘‘तर्जुमा: हासिल और लाहासिल’’, ‘‘लाल क़िले का आखि़री मुशायरा’’, ‘‘दास्तानगोई’’, ‘‘क़व्वाली’’, से होते हुए और तकरीबन नौ बजे शाम-ए-ग़ज़ल ‘‘साज़-ओ-आवाज़’’ पर आकर जश्न-ए-रेख़्ता का दोरोज़ा सफर अपने अंजाम को पहुंचा। इस पूरे दो दिन के दौरान आइआइसी का गोशा-गोशा उर्दू ज़बान की मुहब्बत का गवाह बना। मेरी खुशक़िस्मती थी, कि दिल्ली में पिछले दस सालों से रहने के दौरान उर्दू ज़बान को लेकर किसी प्रोग्राम के हवाले से यह पहला ऐसा मौक़ा था, जिसका मैं गवाह बना। जश्न में शामिल और भी बहुत सी हस्तियां थीं, मसलन- मशहूर फिल्मकार मुज़फ्फर अली, गीतकार इरशाद कामिल, प्रोफेसर सीएम नईम, इंतिज़ार हुसैन, गोपीचंद नारंग, अभिनेत्री नंदिता दास, खालिद जावेद, कवि केदारनाथ सिंह, सलमा सिद्दीकी, ज़ियाउस्सलाम, बारान फारूक़ी, तरन्नुम रियाज़, शम्सुर्रहमान फारूक़ी, शम्सुल हक़ उस्मानी और अबुल करीम कासमी के अलावा और भी दिगर शख़्सियतें मौजूद थीं।
               
Prof Waseem Barelavi in Jashn-e-Rekhta
जश्न-ए-रेख़्ता के हवाले से यह कहने में कितना फख्र महसूस हो रहा है कि सिर्फ एक शख़्स को उर्दू से इस क़दर बेपनाह मुहब्बत हो गयी कि उसने उसे पूरी दुनिया में फैलाने का बीड़ा उठा लिया और वह इस काम में एक हद तक कामयाब भी हो गया। तो यहां सोचिए और गौर कीजिए कि अगर तमाम उर्दू पढ़ने, बोलने, समझने वाले लोग उर्दू से या हिंदी से या अपनी सभी ज़बानों से ऐसी ही बेपनाह मुहब्बत करें, तो मैं समझता हूं कि वह दिन दूर नहीं, जब लोगबाग़ यह कहना बंद कर देंगे कि अंग्रेज़ी सभी ज़बानों पर भारी पड़ रही है। उर्दू हिंदुस्तान में ही पैदा हुई है, इसलिए इसके साथ बेअदबी करना तो खुद के साथ बेअदबी करने जैसा है। उर्दू, हिंदी की छोटी बहन है और ये दोनों ज़बानों ने मिलकर हमें गंगा-जमुनी तहज़ीब दी है, जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में बड़े ही ऐहतराम के साथ दी जाती है। हालांकि सियासत और मज़हब ने ज़बानों का बड़ा ही नुकसान किया है और शायद यही वजह भी है कि उर्दू को मुसलमानों की ज़बान और हिंदी को हिंदुओं की ज़बान मान ली गयी है। लेकिन हमें मशकूर होना चाहिए संजीव सराफ का जिन्होंने रेख़्ता की नींव रखते वक्त मज़हब और सियासत को आड़े नहीं आने दिया और आड़े आते भी कैसे उर्दू से उनकी बेपनाह मुहब्बत जो मौजूद थी। संजीव की उर्दू से मुहब्बत, शुरू हुई रेख़्ता की अदबी रवायत और गंगा-जमुनी तहज़ीब की विरासत के हवाले से यह कहना लाज़मी होगा कि- ‘‘उर्दू हमारे मुल्क की वाहिद ज़बान है। गंगा की जिसमें रूह तो जमुना की जान है।।’’

Friday, February 13, 2015

खतरनाक है धर्म और राजनीति का तामसिक संगम

हमारे देश में धर्म ने जिस तरीके का सर उठाना शुरू किया है और हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था व राजनीति पर हावी होने की कोशिश कर रहा है, वह एक खतरा है। मौजूदा भारत में धर्म की जो पुरजोर दखल राजनीति में बढ़ी है, अभी इसे फासीवादी करार देना जल्दबाजी होगी, लेकिन इस तरह की भावना उसी मनोवृत्ति की तरफ ले जाती दिख रही है, जिसे फासीवादी मनोवृत्ति कहते हैं। अभी यह कहना कि भारत में फासीवादी उभार हो गया है, तो यह बात अतिसरलीकृत हो जायेगी। क्योंकि बीते 67 सालों में जनतांत्रिक आंदोलन भी इस देश में बहुत मजबूत हुए और लोकतांत्रिक आस्थाएं भी बहुत गहरी हुई हैं। धर्म और राजनीति के इस गठजोड़ से उपजी समस्याओं और खतरों पर जब मैंने प्रख्यात समाजशास्त्री प्रोफेसर आनंद कुमार से बात की, तो उन्होंने बहुत ही विस्तार से समझाते हुए इन खतरों से जो आगही की, उसे आप भी यहां समझ सकते हैं...


Prof Anand Kumar

धर्म और राजनीति का गठजोड़ सदियों से चलता आ रहा है। मानव जीवन को ये किस तरह से प्रभावित करता है? 
         धर्म और राजनीति हर मानवीय समाज की दो बुनियादी जरूरतें रही हैं। आदिम काल से धर्म ने एक तरफ मनुष्य को अपने व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन को समझने में मदद की है, तो वहीं दूसरी तरफ राजनीति ने सामाजिक सम्बंधों के उलझन भरे ताने-बाने की व्यवस्था की तलाश को हमेशा एक आधार दिया है। लेकिन धर्म और राजनीति मानवीय समाज के अन्य पहलुओं की तरह से आदिम काल से आज तक लगातार रूप बदलते रहे हैं। धर्म में सात्विकता, राजसिकता और तामसिकता तीनों का होना एक विडम्बना भरा सच है। धर्म ने मनुष्य को सद्मार्ग दिखाया है, लेकिन वहीं धर्म ने मनुष्य और मनुष्य के बीच ऊंची दीवारें भी खड़ी की है। कई दौर ऐसे भी आये हैं, जब धर्म ने मनुष्य को पूर्णता की पराकाष्ठा तक पहुंचा दिया। इसलिए धर्म के बारे में हमेशा एक सद्दृष्टि की जरूरत रही है। इसके तीन पहलू हैं, पहला: आदर्श-दर्शन, दूसरा: सामाजिक व्यवस्था सम्बंधी नियमावली, और तीसरा: आम लोगों को धर्म की दैनिक समझ के लिए कुछ नीति-नियम, तीज-त्यौहार और प्रतीक। इन तीनों के बीच में हमेशा एक तनाव भरा सम्बंध रहा है। धर्म का दार्शनिक आधार सनातन महत्व का होता है। इसमें युग की जरूरतों के साथ बदलाव जरूर हुए हैं, लेकिन उन बदलावों ने युग-परिवर्तन भी पैदा किया है। धर्मों के बीच परस्पर सम्वाद और विवाद का भी सम्बंध होता है। इसलिए धर्मों का एक क्षेत्रीय स्वरूप है, जो ऐतिहासिकता से जुड़ा होता है। दूसरे, भूगोल की सीमाओं से आगे जाकर धर्म अपने दार्शनिक, सामाजिक और कर्मकांडीय आधारों पर मानव समूहों को प्रभावित करने की क्षमता और प्रवृत्ति भी रखता है।

धर्म और राजनीति के सम्बंधों के मद्देनजर धर्म और राजनीति का मूल स्वरूप क्या है?
          धर्मों का नदियों की तरह स्वभाव होता है, जो उस क्षेत्र से सीधा सम्वाद करते हैं। स्थानीय परम्पराएं और सार्वदेशिक परम्पराएं धर्म के दो चेहरे होते हैं। नदियों की ही तरह एक धर्म-धारा अन्य धर्म-धाराओं से प्रवाह प्राप्त करती है और दूसरी धर्म-धाराओं को अपने में समेटती है या स्वयं कई धाराओं में बंट जाया करती है। यह सब धर्म के दार्शनिक, ऐतिहासिक और सामाजिक आधारों से जुड़ा सच है, लेकिन धर्म के अनुयायी इतिहास निरपेक्ष दृष्टि के आदी पाये जाते हैं। देशकाल, पात्र की विविधता की उपेक्षा और अवहेलना भी करते हैं। यह धर्म को यथास्थितिवादी और संकीर्णतावादी ताकतों का औजार बनाने में मदद करता है। लेकिन इस दुनिया में कोई भी धर्म ऐसा नहीं है, जो अपने मूल स्वरूप का बदलाव कालांतर में रोक पाया हो। जिस धर्म में परिवर्तन की प्रवृत्ति नहीं रही है, वह धर्म काल-गति में पीछे छूट जाता है। इसलिए परम्परा और परिवर्तन किसी भी धर्म की दो मूल खूबियां होती हैं परिवर्तनशील धर्म में व्यापकता की क्षमता होती है। परिवर्तनहीन धर्म कर्मकांडों के दलदल में फंसकर गतिविहीन और आभाहीन हो जाते हैं।
         राजनीति की तुलना में धर्म ज्यादा गहराई तक प्रभाव पैदा करता है। राजनीति सदैव देशकाल-पात्र सापेक्ष रहती है, क्योंकि यह समाज के शक्ति-सम्बंधों के संस्कार का व्याकरण बनाती है और हमारे शक्ति-सम्बंध शक्तिवानों के तमाम प्रयासों के बावजूद नश्वर या सतत परिवर्तनशील होते हैं। इसमें आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी और क्षेत्रीयता का बराबर दबाव रहता है। इसीलिए राजनीति के सूत्रधार हमेशा धर्म के वाहकों के साथ यथासम्भव सहअस्तित्व का सम्बंध रखते हैं, जिससे कम से कम धर्म के आधार पर राजनीति के दावों को स्वीकृति और बल मिल सके। राजनीतिज्ञों ने फ्रांसीसी क्रांति से उत्पन्न स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के आधुनिक आदर्शों को धर्म की शक्तियों के जरिये बांधने और साधने दोनों का प्रयास किया है। इस अर्थ में धर्म और राजनीति के रिश्ते में पिछली चार शताब्दियों में कुछ गुणात्मक अंतर पैदा हो चुका है। 

धर्म का राजनीतिकरण और राजनीति का धार्मिकरण हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में किस प्रकार की जीवनशैली का द्योतक है?
        धर्म शुरू से विशिष्टजन और जनसाधारण की दो कोटियां बनाता आया है। जबकि जनतांत्रिक राजनीति में विशिष्टता के लिए एक नकारात्मकता का भाव है। यह राजनीतिक समता का दर्शन है और व्यक्तिमूलक जीवनशैली का समर्थक है। जहां धर्म में बिना पुरोहित के कोई सूत्रधार नहीं हो सकता, बिना आचार्यों के कोई व्याख्या नहीं की जा सकती, बिना मठाधीशों के कोई प्रशिक्षण नहीं मिल सकता, बिना राजपुरुषों और लक्ष्मीपुत्रों के कोई प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता, वहीं जनतांत्रिक आदर्श को अपनाने के बाद से दुनिया के हर देश में राजनीतिक सत्ता का सूत्रधार बनने के लिए आम आदमी और आम औरत के मन में प्रबल आवेग घर कर चुका है। राजसत्ता के दैवीय सिद्धांत के खंडन और सामाजिक समझौता सिद्धांत के प्रवर्तन के बाद से धर्म और राजनीति के रिश्तों में आम आदमी की उपेक्षा असंभव हो चुकी है। इस प्रकार धर्म और राजनीति के बीच तनावपूर्ण सहअस्तित्व का एक नया युग पिछली चार शताब्दियों से विस्तृत हो रहा है। इसका एक समाधान धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत से तलाशा गया है। राज्य का धर्मों के प्रति सरोकार तटस्थता पर रखने की चेष्टा हो रही है। परस्पर जुड़ती दुनिया के दौर में अब कोई भी देश एकधर्मी नहीं रह पायेगा। एक से ज्यादा धर्मों के अनुयायी एक ही राष्ट्र-राज्य के नागरिक होंगे तो राज्य का धर्मों के बीच तटस्थता भाव ही सामाजिक शांति और राज्यसत्ता की प्रभावशीलता के लिए श्रेयस्कर मार्ग है, लेकिन राजनीति इस सिद्धांत का आचरण में ईमानदारी से कार्यान्वयन कठिन बनाती है। जनतांत्रिक राजनीति में बहुमत की कीमत मानी जाती है। बहुमत की वासना पारम्परिक आधारों पर स्थापित संख्याबल को राजनीतिकरण के लिए उकसाती है। आदर्श राजनीति में नागरिकता ही प्रथम और अंतिम आधार मानी गयी है, लेकिन नागरिकों के बीच की सांस्कृतिक विविधता इस एकता को तोड़कर गैर-राजनीतिक आधारों पर बहुमत रचना का अस्वस्थ रास्ता अपनाने का लालच पैदा करते हैं। इसमें भाषा, धर्म, रंगभेद और जातिभेद के दुरुपयोग का अंतहीन सिलसिला चल निकला है। इसको रोकने के लिए नागरिकों के चेतना-स्तर का उठाया जाना स्थायी समाधान है। लेकिन, नागरिक का निर्माण अपने आप में विषमतामय समाज में एक आधी-अधूरी प्रक्रिया होती है। बिना शिक्षा, आजीविका और सामाजिक न्याय के हम सिर्फ राजनीतिक नागरिकता यानी वोट के अधिकार को टिकाउ बना पाये हैं। जब नागरिक के निर्माण की प्रक्रिया ही आधी-अधूरी है, तो नागरिकों के चेतना-निर्माण और उसमें मानवमात्र के प्रति बंधुत्व का भाव पैदा करना बहुत दूर के लक्ष्य हैं। इसीलिए सारी दुनिया में पुरानी राजनीतिक व्यवस्था के खंडहर हो जाने के बावजूद नागरिक-एकता और लोकशक्ति की बुनियाद पर नयी राजनीति की रचना का काम अत्यंत मंथर गति से चल रहा है।
        
धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल पर आपकी राय?
         धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल अर्थात् धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति उपेक्षा, संदेह और घृणा के आधार पर समाज में व्याप्त आर्थिक और सामाजिक विषमता पर से ध्यान हटाना एक असामाजिक रास्ता है। इसका चुनाव के जरिये समाधान नहीं हो पा रहा है। चुनाव ने तो सांप्रदायिकता ही नहीं, जातिवाद और क्षेत्रीयता की आग में भी घी का काम किया है और इन्हें नयी प्रासंगिकता दी है।
      
आज विज्ञान का युग है। फिर भी क्या वजह है कि लोग जितना ही आधुनिक होते जा रहे हैं, उतनी ही अंधभक्ति भी बढ़ रही है?
        धर्म के संदर्भ में विज्ञान और आधुनिकीकरण दो महत्वपूर्ण प्रतिरोधक तत्व हैं। इनसे धर्म के प्रवक्ताओं और प्रचारकों को लगातार असुविधाजनक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। वैसे भी धर्म की सत्ता में हमेशा राजसत्ता के साथ अनुकूलता के दायरों की तलाश जारी रही है। प्रायः राजसत्ता धर्मसत्ता के लिए सहयोगी की भूमिका में रहती है। जनतांत्रिक क्रांतियों के बाद से धर्म के पारम्परिक आधारों में असुरक्षा का भाव जगा है, अधूरापन का भाव है। समाज के प्रति आशंकाएं हैं। वैज्ञानिकता और आधुनिकता में जीवन और मृत्यु के प्रति मानव समाज की दृष्टि में बुनियादी परिवर्तन शुरू किये हैं। असुरक्षा भाव के समाधान के लिए धार्मिक कर्मकांडों की तुलना में वैज्ञानिक निदानों का महत्व बढ़ा है। अब जीवन में सफलता के लिए लोग धर्माचार्यों के पांव पूजने के बजाय, दुनिया भर में बढ़ रहे विद्या केंद्रों में ज्ञान-साधना के लिए जाने लगे हैं। अस्वस्थता के समाधान के लिए धर्मालयों की जगह चिकित्सालयों में भीड़ दिखती है। निजि जीवन और सामुदायिक जीवन के विवादों में भी लोग मठ, मस्जिद और गिरिजाघर की बजाय न्यायालयों में समाधान तलाश रहे हैं। इस गिरावट की दशा में कई धर्माचार्य स्वयं धर्म की आड़ में चल रहे मिथ्याचार को अस्वीकार रहे हैं। उदाहरण के लिए दलाई लामा अपने अनुयायियोें से नये मठों की बजाय विद्यालय और चिकित्सालय बनाने की सलाह देते हैं। इसी प्रकार विश्व भर में हर धर्म के प्रवक्ताओं पर नर-नारी समता के आधार पर नयी सामाजिकता की जरूरत पर बल देने का दबाव साफ दिखता है। गरीबी को भी ईश्वर की निकटता का आधार बताने वालों की तुलना में गरीबी से मुक्ति के लिए जींस परिवर्तन से लेकर धर्म परिवर्तन तक का रास्ता दिखाने वालों के प्रति ज्यादा आकर्षण दिखता है। कुल मिलाकर, धर्म की दुनिया में फैल रहा असुरक्षा भाव नये आधारभूमि की तलाश का उकसावा है। इस क्रम में राजनीति के इस्तेमाल की राह भी एक उपाय दिखता है। इसलिए यूरोप से शुरू सांप्रदायिकता की राजनीति स्वतंत्रता और जनतंत्र के नये प्रभावक्षेत्र अर्थात् एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के नवस्वाधीन देश और समाज में नये आवेग के साथ सक्रिय हैं। धर्म और राजनीति दोनों में अपने प्रभावक्षेत्र में सद्गुण और दुर्गुण दोनों को बढ़ावा देने की अद्भुत क्षमता है। अगर साम्राज्यवाद की पीड़ा से मुक्ति के लिए चले जनांदोलनों का इतिहास देखा जाये, तो धर्म में निहित सात्विकता और राजनीति में निहित सामुहिकता का योगदान बुनियादी महत्व का महा पाया जायेगा। लेकिन स्वाधीनोत्तर समाज में विकसित हुई राजनीति की पड़ताल करने पर सात्विकता की जगह स्वार्थ और संकीर्णता का विस्तार दिखता है। इससे बंटवारे, गृहयुद्ध और नये तरह के अन्यायों एवं असमानताओं का विभत्स सच सामने आता है। दुर्भाग्य से इस अंधेरे दौर की रचना में राजनीतिज्ञों द्वारा धर्म के दुष्टतापूर्ण इस्तेमाल का सच छिपाये नहीं छिपता।
       
ऐसी स्थिति में आपकी नजर में क्या उपाय बचता है?
        इससे परेशान समाज में कई तरह के प्रयास समाधान के लिए उभर चुके हैं। पहला रास्ता अस्वीकार का है। धर्म और राजनीति के तामसिक गठजोड़ से घबराये लोगों में धर्म की स्वयंसिद्ध सामाजिकता और राजनीति की सर्वव्यापी प्रासंगिकता दोनों को इनकारने का भाव पैदा हुआ है। प्रायः पढे़-लिखे मध्यम वर्गीय लोग अपने अराजनीतिक होने की दावे को बड़े गर्व से पेश करते हैं, जबकि अराजनीतिक होना अंततः राजनीतिक यथास्थिति का समर्थन करता है, परिवर्तन को रोकता है। अन्याय के प्रति मौन और तटस्थ बनाता है। ऐसे पढे़-लिखे लोगों का समझदार होने का दावा दुखों से जूझ रहे करोड़ों लोगों को अस्वीकार है। दूसरी तरफ, जन्म से लेकर मृत्यु तक हर मोड़ पर धर्म के द्वारा बनी परम्पराओं, संस्कारों और कर्मकांड के बीच जीने के सच के बावजूद आधुनिकता की दुनिया में जीने वाले लोग बड़ी मासूमियत से यह यकीन करते पाये जाते हैं कि उनका धर्म से कोई वास्ता नहीं रह गया है, क्योंकि वह नवरात्र का व्रत या रमजान के रोजे नहीं रखते हैं। निश्चित तिथियों से जुड़ी तीज-त्योहारों को वे नहीं मानते। तीर्थ यात्राओं के बजाय आनंद, विलास विहार के केंद्रों जैसे हांगकांग, सिंगापुर, हाॅलीवुड आदि में ज्यादा रुचि रखते हैं।

क्या धर्म और राजनीति का तामसिक संगम सिर्फ सत्ता के पायों को ही मजबूत करता है या यह लोक के लिए भी कोई जगह मुहैया कराता है, जिससे कि राष्ट्र निर्माण को मजबूती मिल सके?     
           हम इसे गांधी के धार्मिक विश्वास से समझते हैं। गांधी का रास्ता आधुनिक दौर की विडम्बनाओं से जूझते हुए बना है। इसमें सव-धर्म उदासीनता की बजाय सर्वधर्म-समभाव का आग्रह है। एकल सत्ता के बजाय लोकशक्ति और लोकसंघ में योगदान की प्रतिबद्धता है। स्वधर्म की प्रतिष्ठा की आड़ में अन्य मतावलम्बियों के साथ भेदभाव और दुव्र्यवहार का निषेध है। देशकाल और पात्र से उपर उठकर सभी धर्मों के श्रेष्ठ तत्वों के निरंतर स्मरण और सचेत अनुकरण की जीवनशैली है। इसमें पूरे दुनिया के मुक्तिकामियों ने अनुकरणीय समाधान माना है। अमेरिका के ईसाई धर्मगुरु मार्टिन लूथर किंग से लेकर तिब्बत के बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा तक ने इसे अपनाया है। इसी तरह से दक्षिण अफ्रीका के मार्कसवादी क्रांतिकारी नेलसन मंडेला से लेकर म्यांमार की लोकतांत्रिक क्रांति की नायिका आंग सान सू ची तक इसमें प्रकाश पा चुके हैं। लेकिन, यह आधुनिक जीवन की दो मूल प्रवृत्तियों के निषेध के कारण फिलहाल भारत के राजनेताओं और धर्मगुरुओं दोनों के लिए अस्वीकार्य है। गांधी का धर्म और राजनीति सम्बंधी मानव केंद्रित सात्विकता का रास्ता धर्मगुरुओं के रीति-रिवाजों का निषेध करता है। गांधी का राम मंदिरों में अपार सम्पत्ति संचित कर रहे पंडे-पुजारियों का राम नहीं है। इसमें धर्म परिवर्तन के लिए कोई आग्रह नहीं है। इसमें दरिद्र नारायण ही दुनिया का सबसे बड़ा देवता है। फिर गांधी के मार्ग में भोगवाद का पूर्ण निषेध है। अब अगर भोगवाद की अनुमति नहीं है, तो राजनीति में कौन कूदना चाहेगा। अगर राजनीति रचना और संघर्ष के दो पहियों पर चलने वाला महायान है, तब सत्ता के लिए राजनीति का चोला पहनने वालों को इसमें कहां से आनंद मिलेगा। लेकिन, आज इस दुनिया में वसुधैव कुटुम्बकम का भाव ही एक मात्र निदान है। देश के सुदूर कोनों में घटने वाली शर्मनाक घटनाएं सबका सरोकार बन चुकी हैं। इसमें धर्म और राजनीति का तामसिक संगम सबसे खतरनाक माना जा रहा है। इससे तात्कालिक सफलता मिलने की गारंटी है, तो दीर्घकालीन अमिट कलंक का भी सच जुड़ा हुआ है। आज धर्म और राजनीति का गलत संयोग करके सत्ता पाना अधर्म और असामाजिकता का सबसे निंदनीय उदाहरणा बन चुका है। इसलिए तात्कालिकता के आवेग के बावजूद हमें कालचक्र के महासत्य का ध्यान रखना होगा। सांप्रदायिकता की राजनीति से सीटें जीती जसकती हैं, सरकार भी बनायी जा सकती है, लेकिन राष्ट्र-निर्माण असम्भव है, सभ्यता का विकास तो हो ही नहीं सकता। 

Sunday, December 7, 2014

हाशिम अंसारी के कथनों के निहितार्थ

अयोध्या में 6 दिसम्बर, 92 को हुए ध्वंस की बरसी पर कृष्ण प्रताप सिंह की टिप्पणी...


Krishna Pratap Singh


किसी ने कहा, कौआ कान ले गया और आप कान को भूलकर कौए के पीछे दौड़ पड़े! अयोध्या मामले  में अर्धसत्यों के सहारे अपनी ‘राजनीति’ चमकाने वाले एक बार फिर कुछ ऐसा ही करते दिख रहे हैं। इस बार बहाना है, मामले के वादी हाशिम अंसारी का उसकी पैरवी से हट जाने, रामलला को आजाद देखने की इच्छा जताने और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा करने वाला बयान जो इस कारण भी कुछ ज्यादा सनसनीखेज लग रहा है कि 6दिसम्बर,1992 के ध्वंस की 22वीं बरसी के मौके पर आया है। कई भाई हाशिम के इस ‘आत्मसमर्पण’ या कि ‘हृदयपरिवर्तन’ से खासे गदगद हैं। इतने कि उन्हें ‘धन्यवाद’ दे रहे हैं कि उन्होंने एक झटके में ‘वहीं’ राममन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया!
         दुर्भाग्य से इन भाइयों को मालूम नहीं कि न हाशिम ने आत्मसमर्पण किया है, न ही उनका हृदयपरिवर्तन हुआ है। उसूलन वे पहले जैसे ही हैं और उनकी रामलला को आजाद देखने की चाह को तभी समझा जा सकता है, जब जाना जाये कि उनकी अयोध्या में ही गुजरी 92 वर्ष लम्बी जिन्दगी में बाबरी मस्जिद का वादी होने के बावजूद, उसकी जगह राममन्दिर बनाना चाहने वालों की धार्मिक भावनाओं के अनादर की एक भी मिसाल नहीं है। हाशिम शुरू से ही इस विवाद के राजनीतिकरण के विरुद्ध और उसको अदालती फैसले या बातचीत से हल करने के पक्षधर रहे हैं। इसीलिए अपने प्रतिवादी परमहंस रामचन्द्रदास से उनकी मित्रता में कभी कोई खटास नहीं आयी। अटल जी के राज में परमहंस का निधन हुआ तो हाशिम ने रोते हुए कहा था कि अब वे ‘बहुत अकेले’ हो गये हैं। राजनीतिक दल लगातार समस्याएं नहीं खड़ी करते रहते तो कौन जाने हाशिम व परमहंस स्थानीय लोगों के साथ मिलकर सारे विवाद का किस्सा ही खत्म कर देते।  

Hashim Ansari
            हाशिम अरसे से कहते आ रहे हैं, ‘22-23 दिसम्बर, 1949 की रात रामलला को साजिशन बाबरी मस्जिद में ला बैठाया गया, तो हमने उनकी शान में कोई गुस्ताखी नहीं की। न उन्हें हटाने की कोशिश, न उनके मर्यादाभंग का प्रयास। गुस्से में आकर उनका वह ‘घर’ भी हमने नहीं ढहाया। आज वे जिनके कारण तिरपाल में हैं, वे महलों में रह रहे हैं। उन्हें इलायचीदाना खिलाकर खुद लड्डू खा रहे हैं। ऐसा कब तक चलेगा? रामलला को आजादी मिलनी ही चाहिए।’
             हाशिम ने उनकी आजादी के जतन 30 सितम्बर, 2010 को आये इलाहाबाद उच्चन्यायालय के विवादित भूमि के तीन टुकड़े करके पक्षकारों में बांट देने वाले फैसले के बाद भी किये थे। हनुमानगढ़़ी के महंत ज्ञानदास के साथ मिलकर, कहते हैं कि, वे समाधान के निकट तक पहुंच गये थे और कह दिया था कि सर्वोच्च न्यायालय में अपील नहीं करेंगे। लेकिन ज्ञानदास की मानें तो अशोक सिंघल और विनय कटियार आदि ने ऐसा फच्चर फंसाया कि जीते व पराजित महसूस कर रहे दोनों पक्ष सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गये। 
               अब हाशिम के पैरवी से हटने के निश्चय के पीछे महज उनका स्वास्थ्य है। हृदयाघात के बाद अभी हाल में ही उन्हें पेसमेकर लगा है। एक पैर जख्मी है सो अलग। वे जानते हैं कि उनके पैरवी न करने से सम्बन्धित मुकदमा वापस या खत्म नहीं हो जाने वाला। सेन्ट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड व अन्य पैरवीकार अपना काम करेंगे ही। प्रतिनिधिक चरित्र के मुकदमे यों भी बीच में छोड़े या वापस नहीं लिये जा सकते। फिर, कोई भी अन्य व्यक्ति ऐसी कोशिश से खुद को प्रभावित बताकर उन्हें जारी रखने को आगे आ सकता है। 
               फिर हाशिम को ‘धन्यवाद’ देने वालों को समझना चाहिए कि राममन्दिर निर्माण का रास्ता साफ करने या उसमें बाधा डालने का काम वे कर ही नहीं सकते क्योंकि अब इस मामले में सब कुछ भारत की सरकार व संसद की इच्छा पर निर्भर है। संसद द्वारा विवाद के सिलसिले में 1993 में बनाये गये अयोध्या सरटेन एरिया एक्वीजीशन एक्ट में प्रावधान है कि अधिग्रहीत भूमि पर राममन्दिर, मस्जिद, संग्रहालय, वाचनालय और जनसुविधा के लिए स्नानागार व शौचालय समेत पांच निर्माण होंगे। इसमें सरकार व संसद की इच्छा के बगैर परिवर्तन संभव नहीं है क्योंकि कानून बनाने या बदलने का अधिकार किसी और के पास नहीं। सम्बन्धित पक्ष सुलह भी कर लें तो सरकार की सहमति के बिना उसे लागू नहीं करा पायेंगे। 
               इसलिए अब मुस्लिम पक्ष ने अन्यों की पहल पर समझौतावार्ताओं से तौबा कर ली और तय किया है कि सरकार की ओर से कोई सार्थक समाधान प्रस्ताव आयेगा तो उसी पर विचार करेगा। उसके अनुसार सरकार की जिम्मेदारी है कि वह दोनों पक्षों को स्वीकार्य समाधान तलाशे। लेकिन यही बात कहते हुए हाशिम ने नरेन्द्र मोदी द्वारा अपने चुनाव क्षेत्र में बुनकरों के हित में उठाये गये कुछ कदमों की प्रशंसा कर दी तो उसके भी तरह-तरह के अर्थ निकाले जाने लगे। हाशिम को साफ करना पड़ा कि इसका अर्थ यह नहीं कि वे मन्दिर मस्जिद मामले में भी मोदी के समर्थक हो गये हैं। हां, उन्होंने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाये जाने के बाद से ही इस मामले को तूल देने से जैसा परहेज रखा है, उससे थोड़ी उम्मीद बंधती है कि विहिप के बड़बोले नेताओं द्वारा मन्दिर निर्माण के लिए कानून बनाने के दबाव से पार पाकर वे विवाद के सार्थक समाधान का प्रयास करेंगे। करते हैं तो उनकी राह क्यों रोकी जाये? 
                लेकिन आजम खां कहते हैं कि हाशिम डर गये हैं। कई अन्य लोगों को उनके नये कथनों को किसी ‘डील’ का नतीजा बताने से भी गुरेज नहीं है। लेकिन हाशिम का डरने या डील करने का कोई ज्ञात इतिहास नहीं है। यकीनन, उनके कथनों में उनके रोष, क्षोभ, खीझ, गुस्से, थकान और निराशा को भी पढ़ा जाना चाहिए। हाशिम इसे छिपाते भी नहीं हैं। कहते हैं कि इस लड़ाई में उन्हें अपनों व परायों से हर कदम पर दगा ही मिला। उन्हीं के शब्दों में ‘जो आजम कभी बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमेटी में थे, अब मंत्री हैं तो उन्हें विवादित परिसर में मन्दिर ही मन्दिर नजर आता है, मस्जिद दिखती ही नहीं। मैं उनसे इसके सिवा क्या कहूं कि जब मस्जिद दिखती ही नहीं है तो उसके लिए लड़ाई का ढोंग करके लोगों को उल्लू बनाना बंद करें।’
              सोचिए जरा, हाशिम की दगा वाली टिप्पणी किसके खिलाफ है? सिर्फ उस पत्रकार के, जिससे उन्होंने कहा कि शारीरिक असमर्थता के कारण वे छः दिसम्बर को घर पर ही रहेंगे तो उसने इसको यौम—ए—गम के आयोजन से दूर रहने के उनके निश्चय के रूप में लिया या फिर संविधान, न्यायपालिका व सरकार के  खिलाफ भी, 65 साल लम्बी अदालती लड़ाई में जिनके द्वारा उन्हें और दिवंगत परमहंस को इंसाफ नहीं दिलाया जा सका! यह उनका आत्मसमर्पण है, तो किसके लिए ज्यादा लज्जाजनक है?  

Friday, November 21, 2014

धर्म की खोखली बुनियादों में दबी स्त्री

संस्कृति, परंपरा, आदर्श, तहज़ीब, रीति रिवाज़ और शरियत जैसे बड़े वज़नदार शब्द सुनने में बड़े अच्छे लगते हैं। और ये भी कि इनको शिद्दत से मानना चाहिए और इनका पालन करना चाहिए जिससे समाज में कोई बुराई जड़ न कर जाए। मगर यही शब्द कभी कभार जड़ता का रूप लेकर इंसानी ज़िंदगी में सड़ांध पैदा करने लगते हैं और इन शब्दों की आवाज़ तब इतनी बदबूदार हो जाती है कि इंसान अपने कान सिकोड़ने लगता है। ऐसे शब्दों को नहीं सुनना चाहता। क्यों?


            उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में एक कस्बा है बहादुरगंज। वहां मुसलमानों की अक्सरियत है। हिंदू विरादरी भी है लेकिन बहुत कम। मुस्लिम बहुल इलाका होने की वजह से वहां इस्लामी तहजीब की झलक चारों तरफ दिखाई देती है, मगर वह तहजीब सिर्फ बाहरी आवरण भर है। उस तहजीब की बेरंग सूरतें तो उस आवरण के भीतर मौजूद हैं। और विडंबना देखिए कि इन सूरतों में एक भी सूरत किसी पुरूष की नहीं है। पुरूष सत्तात्मक इस समाज ने औरत के पैरों में धर्म और परंपरा की बेड़ियां डालकर उन्हें किस तरह तड़पने पर मजबूर कर दिया है, इसकी बानगी उस कस्बे के घरों की खिड़कियों से असहाय झांकते उन अबला चेहरों को पढ़कर देखा जा सकता है। वो चेहरे हैं उन लड़कियों के जिन्हें शादी के बाद या तो छोड़ दिया गया है या तलाक दे दिया गया है। उस कस्बे में 50 प्रतिशत ऐसी लड़कियां हैं, एक घर में चार लड़कियों में से दो लड़कियां तलाकशुदा हैं या उन्हें उनके पतियों द्वारा प्रताड़ित कर छोड़ दिया गया है। समाज के लोकलाज से डरी सहमी, अवसादग्रस्त ये लड़कियां अपने मायके में अपने छोटे बच्चों को लेकर किसी कैदी की तरह कैद हैं। भरी जवानी में तलाक का दंश झेल रही इन लड़कियों की पहाड़ सी जिंदगी सिर्फ अल्लाह मियां के भरोसे कैसे कट रही है, इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है। और गरीब मां बाप के पास इतना पैसा नहीं कि वो अपनी बेटियों की मान मर्यादा के लिए केस लड़ सकें।

       कबीर दास जी कहते हैं ‘‘खाला घरे बेटी ब्याहे, घरहीं में करे सगाई।’’ उन लड़कियों के हालात के मद्देनजर इन पंक्तियों की प्रासंगिकता यह है कि मुसलमानो में चार शादियां जायज हैं लेकिन इन चार शादियों के लिए कैसी कैसी कितनी सूरतें हैं, ये ज्यादातर मुसलमान या यूं कहें तो ज्यादातर मुसलमान इसे नहीं जानते। और शरियत ये कि दूध के रिश्ते को छोड़कर किसी भी लड़की से शादी जायज मानी जाती है। ऐसी स्थिति में चाचा, मामा, बुआ, मौसी की लड़की या गांव की किसी और हमबिरादर लड़की से वहां का कोई भी लड़का शादी कर सकता है। इस्लामी शरीयत और तहजीब के चश्में से देखें तो यह अच्छा लग सकता है, लेकिन जब इसके सामाजिक परिणाम को देखते हैं तो गुस्सा फूट पड़ता है।

       दरअसल इसके पीछे एक जबरदस्त कारण है मुस्लिमों का अशिक्षित होना। मुसलमानों में साक्षरता की दर बहुत ही कम है। अगर वो पढ़ते भी हैं तो सिर्फ अपनी धार्मिक किताबों और शरीयत को ही पढ़ते हैं। इनके अंदर दुनिया, समाज की समझदारी कम है और रूढ़िवादिता, कट्टरता ज्यादा है, जिसके परिणाम स्वरूप चार शादी को जायज मानकर तीन को तलाक देकर उनकी जिंदगी बद से बदतर बनाने जैसा घृणित काम करते हुए ये बिल्कुल नहीं सकुचाते, बल्कि ये कहते हैंदृ हम धर्म पे हैं क्योंकि हम जायज पे हैं। मगर तलाक के बाद की नाजायज होने वाली चीजें ये नहीं समझ पाते। यहां तक कि एक घर में जिसने तीन शादियां कर सबको छोड़ दिया है उसी की तीन बहने तलाक लिए बैठी हैं। अब आप सोच सकते हैं कि जहां इस तरह की तहजीब होगी वहां का माहौल क्या होगा? एक तो इनमे शिक्षा की वैसे ही कमी है, दूसरे दारूल ओलूम के मुफ्ती मुल्ला रोज़ कोई न कोई फतवा देते रहते हैं। अभी पिछले दिनो एक फतवा आया था कि ‘‘ मुस्लिम महिलाओं का मर्दों के साथ काम करना गैरइस्लामी है।’’ क्या ये बताएंगे कि तलाक देकर या छोड़कर उन लड़कियों की जिंदगी बरबाद करना कितना इस्लामी है, जिनकी गोद में एक दो बच्चे हैं। ये ओलमा बहादुरगंज या उस जैसे सैकड़ों गांवों और कस्बों की लड़कियों, औरतों के हालात पर क्यों कुछ नहीं बोलते? क्या सारे फतवे औरतों के लिए है, मर्दों के लिए कुछ नहीं? क्या इन्हें इन सब बातों का इल्म नहीं? है। क्योंकि बहादुरगंज जैसे सैकड़ों गांवों और कस्बों के कुछ लोग ही सही उसी दारूल ओलूम में पढ़ाई करते हैं। 


             ये सारे ओलमा भी एक तरह से सत्ताभोगी हैं, जो धार्मिक लबादा पहने अपने मतलब की शरई सियासत करते हैं। मुसलमान गरीब हैं, अशिक्षित हैं, बेरोजगार हैं और लाचार हैं मगर इन मुल्लाओं को इनकी चिंता नहीं है। ये तो बस तब्लीग की दावत देते हैं और बड़ी बड़ी किताबी, शरई बातें करना जानते हैं। ये हाईटेक ओलमा अपनी दुकान चलाने के लिए टीवी पर आकर सानिया मिर्जा की शादी पर और उसके स्कर्ट पर तो ख़ूब बोलते हैं, मगर उन अबलाओं, तलाकशुदा लड़कियों की जिंदगी को देखते हुए, जानते हुए भी कुछ नहीं बोलते। हिन्दुस्तान में आज ज्यादातर मुसलमानो को ये नहीं पता कि मानवाधिकार क्या है? महिला आयोग क्या है? ये खुद के लिए भी कोई कानूनी लड़ाई से डरते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप हमेशा दबे कुचले रहते हैं। लेकिन इसके साथ ही साथ इनमे कट्टरता ऐसी है कि अपने नजदीकी मस्जिदों में नमाज भले न पढ़ें मगर बाबरी मस्जिद बनवाकर वहां नमाज पढ़ने की ख्वाहिश पाल रखे हैं।

       देखा जाए तो मुसलमानो के लिए हिन्दुस्तान से सुरक्षित जगह पूरी दुनिया में कहीं नहीं, लेकिन फिर भी अपने आस पड़ोस की बुराईयों को नजरअंदाज कर दूसरे मुल्कों के मुसलमानों की हालत पर तरस खाकर कहते हैं—‘‘हमें सताया जा रहा है।’’ इन तमाम मौलवी, मुफ्ती, मुल्लाओं को ये सोचना चाहिए कि मुसलमानो में शिक्षा का विस्तार कैसे हो, तभी बहादुरगंज जैसी जगहों पर लड़कियों के साथ हो रहे इन अत्याचारों को रोका जा सकता है। और एक जायज़ समाज का निर्माण किया जा सकता है।  

       स्त्री को जननी कहा जाता है, मगर बाइबिल के मुताबिक ईश्वर ने सबसे पहले एक पुरुष आदम को बनाया और फिर आदम की तरह स्वतंत्र श्रृजन न करके उसी पुरुष की बाईं पसली से एक स्त्री हव्वा को बनाया। जिसे हम अर्धांगिनी की संज्ञा देते हैं। आज भले ही हम स्त्री को आधी दुनिया का दर्जा देकर उसको पुरुष के बराबर हक देने की बात करें लेकिन पुरुष रुपी ईश्वर की सत्ता ने सबसे पहले एक पुरुष को पैदा कर और उसकी बाईं पसली से एक स्त्री को पैदा कर एक पुरुष सत्तात्मक संरचना की नींव डाली, जिसके परिणाम स्वरूप हमारा समाज एक पुरुष सत्तात्मक समाज कहलाने लगा। हिन्दू देवी देवताओं में सर्वपरि ब्रम्हा, विष्णु, महेश भी पुरुष देवता हैं। हालांकि, इनसे कुछ अलग तरह से मुसलमानों की धार्मिक किताब क़ुरान में आता है कि आदमी और औरत के लिए अल्लाह ने फरमाया- ‘मैंने तुम दोनों को एक ही चीज से बनाया है, लेहाजा तुम दोनों एक-दूसरे पर बरतर नहीं हो।’ सच क्या है पता नहीं। लेकिन अगर इन सभी मान्यताओं को के हिसाब से देखा जाए तो हमारी धार्मिक मान्यताओं मे स्त्री के उपेक्षित होने के लिए ईश्वर ही दोषी है। शुरू से ही पुरुष खुद को सबला मानता रहा है और स्त्री को अबला। स्त्री के उपेक्षित होने एक वृहद और प्राचीनतम इतिहास है। तभी तो हम दिन पर दिन आधुनिक होते जा रहे हैं फिर भी हमारी मानसिकता जस की तस, वहीं की वहीं है। अगर हमें उनको पुरुष जैसा हक देना है तो सबसे पहले उस इतिहास को भूलकर पुरुष मानसिकता में बदलाव लाना होगा। जो अभी संभव नहीं लग रहा। 

        छठवीं शताब्दी में मुसलमानों के आखिरी पैगम्बर मुहम्मद साहब जब मक्का में पैदा हुए तो उनके जमाने में लड़कियों, स्त्रियों पर तरह तरह के जुल्म ढाए जाते थे। पैदा होते ही लड़कियों को ज़िंदा जमीन में दफना दिया जाता था, वो इसलिए कि उनको अपनी नाक प्यारी थी। मुहम्मद साहब ने इस कुप्रथा को खत्म किया और इस्लाम धर्म की स्थापना की। मगर उसी इस्लाम ने मर्दों के लिए चार शादी जायज मानकर तलाक की ऐसी व्यवस्था दी जिसमें अगर एक मर्द किसी औरत को तलाक देता है और यदि फिर उसे अपनाना चाहता है तो उस औरत को पहले किसी और मर्द से निकाह करना होगा और फिर उस निकाह को तोड़कर अपने पहले पति से निकाह कर सकेगी। चार शादी सिर्फ मर्दों के लिए, यह एक स्त्री संवेदना के साथ खिलवाड़ सा लगता है। सीता की अग्नि परीक्षा से लेकर सती प्रथा तक में सिर्फ स्त्री ने ही अपने शरीर और संवेदनाओं की बलि दी है। 

        जिस समाज में एक पुरूष कई स्त्रियां रख सकता हो मगर वहीं एक स्त्री कई पुरूष नहीं रख सकती हो और साथ ही स्त्री के लिए विधवा विवाह वर्जित हो उस समाज में नारी के अधिकार रुपी कोमल स्वरों पर पुरुष सत्तात्मक दुगुन तिगुन के आघात से पैदा एक मानसिक अतिवाद का सरगम ही तो है जिसे पुरुष अपना दंभ समझकर गाता फिर रहा है।

        उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों में सगोत्र विवाह के खिलाफ उठ खड़ा हुईं सर्वखाप पंचायतें भी इसी मानसिक अतिवाद का नतीजा हैं। इन पंचायतों में सिर्फ पुरुष भाग लेते हैं, चाहे मसला भले ही किसी स्त्री से जुड़ा हो। जिस पंचायत में महिलाओं की कोई भागीदारी नहीं वहां कैसा फैसला हो सकता है ये समझना बहुत आसान है। ये कैसी विडम्बना है रूढ़िवादिता और धर्म की सगोत्र विवाह की सजा के नाम पर उस लड़की के साथ पहले सामुहिक बलात्कार और फिर हत्या जो उनके गांव और गोत्र के ही हैं, जिन्हें पंचायतें भाई बहन तक मानती हैं।

       18 जून 2010 को दिल्ली हाई कोर्ट ने नरेश कादियान के हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन कर गोत्र शादियों पर प्रतिबंध लगाने की जनहित याचिका को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति शिवनारायण ढींगरा व न्यायमूर्ति एके पाठक की खंडपीठ ने सुनवाई में याची से पूछा कि गोत्र क्या होता है? याची ने कहा, यह हिन्दू मान्यता है। कोर्ट ने इस मान्यता के तर्क को खारिज करते हुए कहा, किसी भी हिन्दू ग्रंथ में इस प्रकार के विवाह पर प्रतिबंध के बारे में नहीं लिखा गया है और ना ही कोई मान्यता है। जाहिर सी बात है ये परंपरायें,मान्यताएं किसी विशेष देश काल का परिणाम हैं जिन्हें आज के परिप्रेक्ष में देखना सरासर अनुचित है। इन मान्यताओं का कोई प्रमाणिक धर्मग्रंथ या शाष्त्र नहीं है। 


        दरअसल गोत्र का ये मसला सिर्फ गोत्र का नहीं लगता। इस गोत्रीय मान्यता की आड़ में ये सवर्ण पंचायतें दलितों, गरीबों में पनप रहे प्रेम और आधुनिकता को फूटी आंख नहीं देखतीं। इन पंचायतों के सदस्य रसूख वाले होते हैं जहां सिर्फ उन्ही की मरजी चलती है। यह परंपरा का ढोंग ही तो है जो सामुहिक बलात्कार करते समय ये नहीं सोच पाते कि वो लड़की उन्ही के गांव की उन्ही की बहन है। जाहिर है परंपरा, मान्यता या आडम्बर के बीच किसी सोच के लिए कोई जगह नहीं बचती। ये 21वीं सदी के भारत का विभत्स चेहरा है जहां एक तरफ तो आधुनिक होने की बात की जाती है तो दूसरी तरफ स्त्रियों का मानसिक, शारीरिक शोषण किया जाता है और उनकी संवेदनाओं पर रूढ़िगत परंपराओं का कुठाराघात किया जाता है। ये वो भारत नहीं लगता जहां नारी को शक्ति का रूप कहा जाता है और उसकी पूजा की जाती है। 

       एक पंक्ति है— ‘‘ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी। ये सब ताड़न के अधिकारी।।’’ इस लाइन में कवि ने नारी को भी ताड़न का अधिकारी मानकर एक वैचारिक भूल की थी जिसे हम आज तक ढो रहे हैं। वह कवि भी पुरुष था जिसने अपने दंभ का परिचय देकर नारी पुरुष के बीच एक लकीर खींच दी। तमाम रूढ़िगत परंपराओं को दरकिनार कर आधुनिक मानसिकता से इस खाई को पाटने की जरूरत है तभी स्त्री को पुरुष जैसा अधिकार मिल सकेगा।