Sunday, March 22, 2015

राजनीतिक खेल

तुम अनाज उगाओगे
तुम्हे रोटी नहीं मिलेगी,
तुम ईंट-पत्थर जोड़ोगे
तुम्हें सड़क पर सोना होगा,
तुम कपड़े बुनोगे
और तुम नंगे रहोगे,
क्योंकि अब लोकतंत्र
अपनी परिभाषा बदल चुका है
लोकतंत्र में अब लोक
एक कोरी अवधारणा मात्र है,
सत्ता तुम्हारे हाथ में नहीं
पूंजी के हाथ में है
और पूंजी
नीराओं, राजाओ, कलमाडियों,
अदाणियों, अंबानियों और टाटाओं के हाथ में है,
तुम्हारी जबान, तुम्हारी मेहनत
तुम्हारी स्वतंत्रता, तुम्हारा अधिकार
सिर्फ संवैधानिक कागजों में है
हकीकत में नहीं,
तभी तो,
तुम्हारी चंद रुपये की चोरी
तुम्हें जेल पहुंचा देती है
मगर,
उनकी अरबों की हेराफेरी
महज एक
राजनीतिक खेल बनकर रह जाती है...

Friday, March 20, 2015

जश्न-ए-रेख़्ता : 14-15 March, IIC, New Delhi

Inauguration of Jashn-e-Rekhta
उर्दू शायरी से मुहब्बत का जश्न

किसी मुल्क को अगर बहुत ही नज़दीक और गहराई से जानना हो, वहां की अवाम के दिलों में मचलते जज़्बात से राब्ता कायम करना हो, उसकी सियासत, अदबी नफासत, दीनी रवायत और इल्मी नज़ाकत से रूबरू होना हो, तो सबसे पहले उसकी ज़बान को जानिए, समझिए और हो सके तो उसके लहजे़ में पूरी तरह से उतर जाइए। इस बात से सिर्फ हमीं नहीं, बल्कि दुनिया के तमाम दानिशवर भी बड़ी ही शिद्दत से इत्तेफाक रखते हैं। कुछ तो ऐसे भी हैं जो सिर्फ इत्तेफाक ही नहीं रखते, बल्कि उससे बेपनाह मुहब्बत भी करते हैं। उन्हीं चंद मुहब्बत करने वाले लोगों में एक नाम संजीव सराफ का भी आता है, जिन्होंने नोएडा में रेख़्ता फाउंडेशन की नींव रखी और उर्दू ज़बान को शिद्दत से महसूस करने वालों के लिए https://rekhta.org/ नाम की वेबसाइट की बुनियाद डाली। खुद संजीव सराफ की ज़ुबां में- ‘‘रेख़्ता, मेरी उर्दू से मुहब्बत का एक हसीन-ओ-तरीन नज़राना है।’’

Inaugural speech of Sanjeev Saraf in Jashn-e-Rekhta
            कभी उर्दू और फारसी के उस्ताद शायर ‘मिर्ज़ा असदुल्लाह खां ग़ालिब’ ने मीर तकी मीर की एक ग़ज़ल को सुनकर कहा था ‘‘रेख़्ता के तुम ही उस्ताद नहीं ग़ालिब। कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था।।’’ ज़ाहिर है तब ग़ालिब ने मीर और उनकी शायरी की तारीफ की थी और यह शे’र कहा था, लेकिन आज संजीव सराफ को उनकी उर्दू शायरी से बेपनाह मुहब्बत के लिए कहा जा सकता है कि आज वे सचमुच में ‘रेख़्ता’ के उस्ताद हैं। संजीव सराफ ने बिना किसी मुनाफे के रेख़्ता वेबसाइट के ज़रिये उर्दू शायरी को तीन ज़बानों (उर्दू, देवनागरी और रोमन लिपियों में) में पेश कर न सिर्फ दुनिया भर में उर्दू के दायरे को बढ़ाया है, बल्कि नुक्ता और इज़ाफत के सही-सही इस्तेमाल के साथ बेहतरीन उर्दू बोलने और समझने को लेकर एक उम्दा पहचान भी बनायी है। संजीव सराफ यहीं नहीं रुके, बल्कि इसे और आगे ले जाने के लिए ‘जश्न-ए-रेख़्ता’ नाम से एक दोरोज़ा प्रोग्राम का ऐलान भी कर दिया, जो गुजिश्ता 14 और 15 मार्च को दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (आइआइसी) में बहुत ही खूबसूरत अंदाज़ में अपने कामयाब अंजाम को पहुंचा।

Javed Akhtar and Rakshanda Jaleel in Jashn-e-Rekhta
            एक ज़माने में दिल्ली के मशहूर शायर ‘दाग़ देहलवी’ कहते हैं- ‘‘उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं दाग़। सारे जहां में धूम हमारी ज़बां की है।।’’ अरसा पहले यह शे’र हिंदुस्तान और उसकी एक मक़बूल ज़बान उर्दू की तर्जुमानी करता था, लेकिन गुजिश्ता वक्त के कुछ वक्फे में उर्दू पढ़ने और लिखने में आयी कमी से ऐसा महसूस होने लगा था कि शायद हमारी आगे आने वाली पीढ़ियां उर्दू ज़बान से महरूम रह जायें। इस मायूसी के आलम में रेख़्ता की शुरुआत और फिर जश्न-ए-रेख़्ता का एहतमाम इस बात की तस्दीक करता है कि हमारी आने वाली पीढ़ियां उर्दू ज़बान से मुहब्बत करती रहेंगी।

              दो दिन तक चले जश्न-ए-रेख़्ता के खूबसूरत अदबी माहौल में हिंदुस्तान और दूसरे ममालिक पाकिस्तान, अमेरिका और कनाडा से आये तकरीबन 60 से ज्यादा शायरों, फनकारों, गुलोकारों, दानिशवरों और अदबी शख्सियतों ने अपनी शिरकत से इंडिया इंटरनेशनल सेंटर को खुशरंग बना दिया था। प्रोग्राम के पहले दिन हिंदी फिल्मी दुनिया के मशहूर फिल्म लेखक, शायर और गीतकार जनाब जावेद अख़्तर से रख्शंदा जलील ने उर्दू शायरी के हवाले से खूब सारी गुफ्तगू की। उसके बाद ‘उर्दू और हिंदी: क़ुर्बतें और फासले’ मौजू पर हिंदी के अदीब अशोक बाजपेयी, सियासी दानिशवर पुरुषोत्तम अग्रवाल और उर्दू अदीब शमीम हनफी ने अपनी दिली बातों से वहां मौजूद लोगों के दिल-ओ-दिमाग पर बेहतरीन दस्तक दी। शमीम हनफी ने कहा कि उर्दू हो या हिंदी इन दोनों ज़बानों को सियासत और मज़हब से बचाने की ज़रूरत है। हनफी ने बयान फरमाया कि मुल्क की आज़ादी के बाद से ही उर्दू ज़बान का वजूद ख़तरे में रहा है, क्योंकि कुछ लोगों ने इसे सिर्फ मुसलमानों की ज़बान मान ली है। ज़ाहिर है कि उर्दू हो या हिंदी, ज़बानें किसी मख्सूस कौम या मज़हब की नहीं होती हैं, बल्कि वे तो पूरे मुल्क की तर्जुमानी करती हैं।

Shaam-e-Ghazal in Jashn-e-Rekhta
              शाम चार बजे ‘‘मुशायरे का बदलता रंग-रूप’’ में लोगों से रूबरू हुए एनडीटीवी के एंकर रवीश कुमार ने हिंदी कवि डाक्टर कुमार विश्वास, एहसासात की दुनिया के मशहूर शायर मुनव्वर राना और अमेरिका से आये सत्यपाल आनंद से अपने सहाफी अंदाज़ में ख़ूब गुफ्तगू की और लोगों को यह एहसास नहीं होने दिया कि वे जश्न-ए-रेख़्ता की डाइस पर हैं या फिर टीवी के परदे पर। अगले प्रोग्राम ‘‘उर्दू शायरी और तहज़ीब: एक ज़ाती तजुर्बा’’ में पाकिस्तानी अखबार डान के दिल्ली ब्यूरो के सहाफी सईद नकवी और ओबैद सिद्दीकी ने अपने-अपने तजुर्बात से लोगों को रूबरू कराया और फिर शाम सात बजे फिल्म गरम हवा की स्क्रीनिंग के बाद शाम नौ बजे ‘‘मुशायरा: बज़्म-ए-सुख़न’’ शुरू हुआ, जिसमें तशरीफ फरमां शायर थे- अमजद इस्लाम अमजद, अनवर शउर, अश्फाक़ हुसैन, फरहत एहसास, जावेद अख़्तर, मोहम्मद अल्वी, निदा फाज़ली और वसीम बरेलवी। इन सभी शायरों ने अपने शे’र-ओ-सुखन से ऐसा शमा बांधा कि जश्न-ए-रेख़्ता का मेयार इतनी उंचाई पर पहुंच गया, जहां से यही आवाज़ सुनायी दे रही थी कि ‘‘सारे जहां में धूम हमारी ज़बां की है...’’
                ‘‘उर्दू अदब की तानीसी आवाज़’’, ‘‘उर्दू-इनसानी वहदत की ज़बान’’, ‘‘इंटरनेट की दुनिया में उर्दू’’, ‘‘उर्दू में जासूसी अदब’’, ‘‘अख़्तरी: ए ट्रिब्यूट टू बेग़म अख़्तर’’ जैसे कई और खूबसूरत प्राग्रामों का हिस्सा बनने के लिए लोग बेक़रार नजर आ रहे थे और शायद यही वजह रही कि इंडिया इंटरनेशनल के आडीटोरियम, कान्फरेंस रूम, फाउंटेन लान्स और मल्टपरपज हाल की सभी सीटें भर चुकी थीं।
Ravish kumar and Munawar Rana in Jashn-e-Rekhta
               जश्न-ए-रेख़्ता के दूसरे दिन की शुरुआत ‘‘टेटवाल का कुत्ता’’ नाटक से हुई। और फिर ‘‘ग़ज़ल: अहद बा अहद’’, ‘‘फिल्मों की ज़बान उर्दू’’, ‘‘तर्जुमा: हासिल और लाहासिल’’, ‘‘लाल क़िले का आखि़री मुशायरा’’, ‘‘दास्तानगोई’’, ‘‘क़व्वाली’’, से होते हुए और तकरीबन नौ बजे शाम-ए-ग़ज़ल ‘‘साज़-ओ-आवाज़’’ पर आकर जश्न-ए-रेख़्ता का दोरोज़ा सफर अपने अंजाम को पहुंचा। इस पूरे दो दिन के दौरान आइआइसी का गोशा-गोशा उर्दू ज़बान की मुहब्बत का गवाह बना। मेरी खुशक़िस्मती थी, कि दिल्ली में पिछले दस सालों से रहने के दौरान उर्दू ज़बान को लेकर किसी प्रोग्राम के हवाले से यह पहला ऐसा मौक़ा था, जिसका मैं गवाह बना। जश्न में शामिल और भी बहुत सी हस्तियां थीं, मसलन- मशहूर फिल्मकार मुज़फ्फर अली, गीतकार इरशाद कामिल, प्रोफेसर सीएम नईम, इंतिज़ार हुसैन, गोपीचंद नारंग, अभिनेत्री नंदिता दास, खालिद जावेद, कवि केदारनाथ सिंह, सलमा सिद्दीकी, ज़ियाउस्सलाम, बारान फारूक़ी, तरन्नुम रियाज़, शम्सुर्रहमान फारूक़ी, शम्सुल हक़ उस्मानी और अबुल करीम कासमी के अलावा और भी दिगर शख़्सियतें मौजूद थीं।
               
Prof Waseem Barelavi in Jashn-e-Rekhta
जश्न-ए-रेख़्ता के हवाले से यह कहने में कितना फख्र महसूस हो रहा है कि सिर्फ एक शख़्स को उर्दू से इस क़दर बेपनाह मुहब्बत हो गयी कि उसने उसे पूरी दुनिया में फैलाने का बीड़ा उठा लिया और वह इस काम में एक हद तक कामयाब भी हो गया। तो यहां सोचिए और गौर कीजिए कि अगर तमाम उर्दू पढ़ने, बोलने, समझने वाले लोग उर्दू से या हिंदी से या अपनी सभी ज़बानों से ऐसी ही बेपनाह मुहब्बत करें, तो मैं समझता हूं कि वह दिन दूर नहीं, जब लोगबाग़ यह कहना बंद कर देंगे कि अंग्रेज़ी सभी ज़बानों पर भारी पड़ रही है। उर्दू हिंदुस्तान में ही पैदा हुई है, इसलिए इसके साथ बेअदबी करना तो खुद के साथ बेअदबी करने जैसा है। उर्दू, हिंदी की छोटी बहन है और ये दोनों ज़बानों ने मिलकर हमें गंगा-जमुनी तहज़ीब दी है, जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में बड़े ही ऐहतराम के साथ दी जाती है। हालांकि सियासत और मज़हब ने ज़बानों का बड़ा ही नुकसान किया है और शायद यही वजह भी है कि उर्दू को मुसलमानों की ज़बान और हिंदी को हिंदुओं की ज़बान मान ली गयी है। लेकिन हमें मशकूर होना चाहिए संजीव सराफ का जिन्होंने रेख़्ता की नींव रखते वक्त मज़हब और सियासत को आड़े नहीं आने दिया और आड़े आते भी कैसे उर्दू से उनकी बेपनाह मुहब्बत जो मौजूद थी। संजीव की उर्दू से मुहब्बत, शुरू हुई रेख़्ता की अदबी रवायत और गंगा-जमुनी तहज़ीब की विरासत के हवाले से यह कहना लाज़मी होगा कि- ‘‘उर्दू हमारे मुल्क की वाहिद ज़बान है। गंगा की जिसमें रूह तो जमुना की जान है।।’’

Friday, February 13, 2015

खतरनाक है धर्म और राजनीति का तामसिक संगम

हमारे देश में धर्म ने जिस तरीके का सर उठाना शुरू किया है और हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था व राजनीति पर हावी होने की कोशिश कर रहा है, वह एक खतरा है। मौजूदा भारत में धर्म की जो पुरजोर दखल राजनीति में बढ़ी है, अभी इसे फासीवादी करार देना जल्दबाजी होगी, लेकिन इस तरह की भावना उसी मनोवृत्ति की तरफ ले जाती दिख रही है, जिसे फासीवादी मनोवृत्ति कहते हैं। अभी यह कहना कि भारत में फासीवादी उभार हो गया है, तो यह बात अतिसरलीकृत हो जायेगी। क्योंकि बीते 67 सालों में जनतांत्रिक आंदोलन भी इस देश में बहुत मजबूत हुए और लोकतांत्रिक आस्थाएं भी बहुत गहरी हुई हैं। धर्म और राजनीति के इस गठजोड़ से उपजी समस्याओं और खतरों पर जब मैंने प्रख्यात समाजशास्त्री प्रोफेसर आनंद कुमार से बात की, तो उन्होंने बहुत ही विस्तार से समझाते हुए इन खतरों से जो आगही की, उसे आप भी यहां समझ सकते हैं...


Prof Anand Kumar

धर्म और राजनीति का गठजोड़ सदियों से चलता आ रहा है। मानव जीवन को ये किस तरह से प्रभावित करता है? 
         धर्म और राजनीति हर मानवीय समाज की दो बुनियादी जरूरतें रही हैं। आदिम काल से धर्म ने एक तरफ मनुष्य को अपने व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन को समझने में मदद की है, तो वहीं दूसरी तरफ राजनीति ने सामाजिक सम्बंधों के उलझन भरे ताने-बाने की व्यवस्था की तलाश को हमेशा एक आधार दिया है। लेकिन धर्म और राजनीति मानवीय समाज के अन्य पहलुओं की तरह से आदिम काल से आज तक लगातार रूप बदलते रहे हैं। धर्म में सात्विकता, राजसिकता और तामसिकता तीनों का होना एक विडम्बना भरा सच है। धर्म ने मनुष्य को सद्मार्ग दिखाया है, लेकिन वहीं धर्म ने मनुष्य और मनुष्य के बीच ऊंची दीवारें भी खड़ी की है। कई दौर ऐसे भी आये हैं, जब धर्म ने मनुष्य को पूर्णता की पराकाष्ठा तक पहुंचा दिया। इसलिए धर्म के बारे में हमेशा एक सद्दृष्टि की जरूरत रही है। इसके तीन पहलू हैं, पहला: आदर्श-दर्शन, दूसरा: सामाजिक व्यवस्था सम्बंधी नियमावली, और तीसरा: आम लोगों को धर्म की दैनिक समझ के लिए कुछ नीति-नियम, तीज-त्यौहार और प्रतीक। इन तीनों के बीच में हमेशा एक तनाव भरा सम्बंध रहा है। धर्म का दार्शनिक आधार सनातन महत्व का होता है। इसमें युग की जरूरतों के साथ बदलाव जरूर हुए हैं, लेकिन उन बदलावों ने युग-परिवर्तन भी पैदा किया है। धर्मों के बीच परस्पर सम्वाद और विवाद का भी सम्बंध होता है। इसलिए धर्मों का एक क्षेत्रीय स्वरूप है, जो ऐतिहासिकता से जुड़ा होता है। दूसरे, भूगोल की सीमाओं से आगे जाकर धर्म अपने दार्शनिक, सामाजिक और कर्मकांडीय आधारों पर मानव समूहों को प्रभावित करने की क्षमता और प्रवृत्ति भी रखता है।

धर्म और राजनीति के सम्बंधों के मद्देनजर धर्म और राजनीति का मूल स्वरूप क्या है?
          धर्मों का नदियों की तरह स्वभाव होता है, जो उस क्षेत्र से सीधा सम्वाद करते हैं। स्थानीय परम्पराएं और सार्वदेशिक परम्पराएं धर्म के दो चेहरे होते हैं। नदियों की ही तरह एक धर्म-धारा अन्य धर्म-धाराओं से प्रवाह प्राप्त करती है और दूसरी धर्म-धाराओं को अपने में समेटती है या स्वयं कई धाराओं में बंट जाया करती है। यह सब धर्म के दार्शनिक, ऐतिहासिक और सामाजिक आधारों से जुड़ा सच है, लेकिन धर्म के अनुयायी इतिहास निरपेक्ष दृष्टि के आदी पाये जाते हैं। देशकाल, पात्र की विविधता की उपेक्षा और अवहेलना भी करते हैं। यह धर्म को यथास्थितिवादी और संकीर्णतावादी ताकतों का औजार बनाने में मदद करता है। लेकिन इस दुनिया में कोई भी धर्म ऐसा नहीं है, जो अपने मूल स्वरूप का बदलाव कालांतर में रोक पाया हो। जिस धर्म में परिवर्तन की प्रवृत्ति नहीं रही है, वह धर्म काल-गति में पीछे छूट जाता है। इसलिए परम्परा और परिवर्तन किसी भी धर्म की दो मूल खूबियां होती हैं परिवर्तनशील धर्म में व्यापकता की क्षमता होती है। परिवर्तनहीन धर्म कर्मकांडों के दलदल में फंसकर गतिविहीन और आभाहीन हो जाते हैं।
         राजनीति की तुलना में धर्म ज्यादा गहराई तक प्रभाव पैदा करता है। राजनीति सदैव देशकाल-पात्र सापेक्ष रहती है, क्योंकि यह समाज के शक्ति-सम्बंधों के संस्कार का व्याकरण बनाती है और हमारे शक्ति-सम्बंध शक्तिवानों के तमाम प्रयासों के बावजूद नश्वर या सतत परिवर्तनशील होते हैं। इसमें आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी और क्षेत्रीयता का बराबर दबाव रहता है। इसीलिए राजनीति के सूत्रधार हमेशा धर्म के वाहकों के साथ यथासम्भव सहअस्तित्व का सम्बंध रखते हैं, जिससे कम से कम धर्म के आधार पर राजनीति के दावों को स्वीकृति और बल मिल सके। राजनीतिज्ञों ने फ्रांसीसी क्रांति से उत्पन्न स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के आधुनिक आदर्शों को धर्म की शक्तियों के जरिये बांधने और साधने दोनों का प्रयास किया है। इस अर्थ में धर्म और राजनीति के रिश्ते में पिछली चार शताब्दियों में कुछ गुणात्मक अंतर पैदा हो चुका है। 

धर्म का राजनीतिकरण और राजनीति का धार्मिकरण हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में किस प्रकार की जीवनशैली का द्योतक है?
        धर्म शुरू से विशिष्टजन और जनसाधारण की दो कोटियां बनाता आया है। जबकि जनतांत्रिक राजनीति में विशिष्टता के लिए एक नकारात्मकता का भाव है। यह राजनीतिक समता का दर्शन है और व्यक्तिमूलक जीवनशैली का समर्थक है। जहां धर्म में बिना पुरोहित के कोई सूत्रधार नहीं हो सकता, बिना आचार्यों के कोई व्याख्या नहीं की जा सकती, बिना मठाधीशों के कोई प्रशिक्षण नहीं मिल सकता, बिना राजपुरुषों और लक्ष्मीपुत्रों के कोई प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता, वहीं जनतांत्रिक आदर्श को अपनाने के बाद से दुनिया के हर देश में राजनीतिक सत्ता का सूत्रधार बनने के लिए आम आदमी और आम औरत के मन में प्रबल आवेग घर कर चुका है। राजसत्ता के दैवीय सिद्धांत के खंडन और सामाजिक समझौता सिद्धांत के प्रवर्तन के बाद से धर्म और राजनीति के रिश्तों में आम आदमी की उपेक्षा असंभव हो चुकी है। इस प्रकार धर्म और राजनीति के बीच तनावपूर्ण सहअस्तित्व का एक नया युग पिछली चार शताब्दियों से विस्तृत हो रहा है। इसका एक समाधान धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत से तलाशा गया है। राज्य का धर्मों के प्रति सरोकार तटस्थता पर रखने की चेष्टा हो रही है। परस्पर जुड़ती दुनिया के दौर में अब कोई भी देश एकधर्मी नहीं रह पायेगा। एक से ज्यादा धर्मों के अनुयायी एक ही राष्ट्र-राज्य के नागरिक होंगे तो राज्य का धर्मों के बीच तटस्थता भाव ही सामाजिक शांति और राज्यसत्ता की प्रभावशीलता के लिए श्रेयस्कर मार्ग है, लेकिन राजनीति इस सिद्धांत का आचरण में ईमानदारी से कार्यान्वयन कठिन बनाती है। जनतांत्रिक राजनीति में बहुमत की कीमत मानी जाती है। बहुमत की वासना पारम्परिक आधारों पर स्थापित संख्याबल को राजनीतिकरण के लिए उकसाती है। आदर्श राजनीति में नागरिकता ही प्रथम और अंतिम आधार मानी गयी है, लेकिन नागरिकों के बीच की सांस्कृतिक विविधता इस एकता को तोड़कर गैर-राजनीतिक आधारों पर बहुमत रचना का अस्वस्थ रास्ता अपनाने का लालच पैदा करते हैं। इसमें भाषा, धर्म, रंगभेद और जातिभेद के दुरुपयोग का अंतहीन सिलसिला चल निकला है। इसको रोकने के लिए नागरिकों के चेतना-स्तर का उठाया जाना स्थायी समाधान है। लेकिन, नागरिक का निर्माण अपने आप में विषमतामय समाज में एक आधी-अधूरी प्रक्रिया होती है। बिना शिक्षा, आजीविका और सामाजिक न्याय के हम सिर्फ राजनीतिक नागरिकता यानी वोट के अधिकार को टिकाउ बना पाये हैं। जब नागरिक के निर्माण की प्रक्रिया ही आधी-अधूरी है, तो नागरिकों के चेतना-निर्माण और उसमें मानवमात्र के प्रति बंधुत्व का भाव पैदा करना बहुत दूर के लक्ष्य हैं। इसीलिए सारी दुनिया में पुरानी राजनीतिक व्यवस्था के खंडहर हो जाने के बावजूद नागरिक-एकता और लोकशक्ति की बुनियाद पर नयी राजनीति की रचना का काम अत्यंत मंथर गति से चल रहा है।
        
धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल पर आपकी राय?
         धर्म के राजनीतिक इस्तेमाल अर्थात् धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति उपेक्षा, संदेह और घृणा के आधार पर समाज में व्याप्त आर्थिक और सामाजिक विषमता पर से ध्यान हटाना एक असामाजिक रास्ता है। इसका चुनाव के जरिये समाधान नहीं हो पा रहा है। चुनाव ने तो सांप्रदायिकता ही नहीं, जातिवाद और क्षेत्रीयता की आग में भी घी का काम किया है और इन्हें नयी प्रासंगिकता दी है।
      
आज विज्ञान का युग है। फिर भी क्या वजह है कि लोग जितना ही आधुनिक होते जा रहे हैं, उतनी ही अंधभक्ति भी बढ़ रही है?
        धर्म के संदर्भ में विज्ञान और आधुनिकीकरण दो महत्वपूर्ण प्रतिरोधक तत्व हैं। इनसे धर्म के प्रवक्ताओं और प्रचारकों को लगातार असुविधाजनक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। वैसे भी धर्म की सत्ता में हमेशा राजसत्ता के साथ अनुकूलता के दायरों की तलाश जारी रही है। प्रायः राजसत्ता धर्मसत्ता के लिए सहयोगी की भूमिका में रहती है। जनतांत्रिक क्रांतियों के बाद से धर्म के पारम्परिक आधारों में असुरक्षा का भाव जगा है, अधूरापन का भाव है। समाज के प्रति आशंकाएं हैं। वैज्ञानिकता और आधुनिकता में जीवन और मृत्यु के प्रति मानव समाज की दृष्टि में बुनियादी परिवर्तन शुरू किये हैं। असुरक्षा भाव के समाधान के लिए धार्मिक कर्मकांडों की तुलना में वैज्ञानिक निदानों का महत्व बढ़ा है। अब जीवन में सफलता के लिए लोग धर्माचार्यों के पांव पूजने के बजाय, दुनिया भर में बढ़ रहे विद्या केंद्रों में ज्ञान-साधना के लिए जाने लगे हैं। अस्वस्थता के समाधान के लिए धर्मालयों की जगह चिकित्सालयों में भीड़ दिखती है। निजि जीवन और सामुदायिक जीवन के विवादों में भी लोग मठ, मस्जिद और गिरिजाघर की बजाय न्यायालयों में समाधान तलाश रहे हैं। इस गिरावट की दशा में कई धर्माचार्य स्वयं धर्म की आड़ में चल रहे मिथ्याचार को अस्वीकार रहे हैं। उदाहरण के लिए दलाई लामा अपने अनुयायियोें से नये मठों की बजाय विद्यालय और चिकित्सालय बनाने की सलाह देते हैं। इसी प्रकार विश्व भर में हर धर्म के प्रवक्ताओं पर नर-नारी समता के आधार पर नयी सामाजिकता की जरूरत पर बल देने का दबाव साफ दिखता है। गरीबी को भी ईश्वर की निकटता का आधार बताने वालों की तुलना में गरीबी से मुक्ति के लिए जींस परिवर्तन से लेकर धर्म परिवर्तन तक का रास्ता दिखाने वालों के प्रति ज्यादा आकर्षण दिखता है। कुल मिलाकर, धर्म की दुनिया में फैल रहा असुरक्षा भाव नये आधारभूमि की तलाश का उकसावा है। इस क्रम में राजनीति के इस्तेमाल की राह भी एक उपाय दिखता है। इसलिए यूरोप से शुरू सांप्रदायिकता की राजनीति स्वतंत्रता और जनतंत्र के नये प्रभावक्षेत्र अर्थात् एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के नवस्वाधीन देश और समाज में नये आवेग के साथ सक्रिय हैं। धर्म और राजनीति दोनों में अपने प्रभावक्षेत्र में सद्गुण और दुर्गुण दोनों को बढ़ावा देने की अद्भुत क्षमता है। अगर साम्राज्यवाद की पीड़ा से मुक्ति के लिए चले जनांदोलनों का इतिहास देखा जाये, तो धर्म में निहित सात्विकता और राजनीति में निहित सामुहिकता का योगदान बुनियादी महत्व का महा पाया जायेगा। लेकिन स्वाधीनोत्तर समाज में विकसित हुई राजनीति की पड़ताल करने पर सात्विकता की जगह स्वार्थ और संकीर्णता का विस्तार दिखता है। इससे बंटवारे, गृहयुद्ध और नये तरह के अन्यायों एवं असमानताओं का विभत्स सच सामने आता है। दुर्भाग्य से इस अंधेरे दौर की रचना में राजनीतिज्ञों द्वारा धर्म के दुष्टतापूर्ण इस्तेमाल का सच छिपाये नहीं छिपता।
       
ऐसी स्थिति में आपकी नजर में क्या उपाय बचता है?
        इससे परेशान समाज में कई तरह के प्रयास समाधान के लिए उभर चुके हैं। पहला रास्ता अस्वीकार का है। धर्म और राजनीति के तामसिक गठजोड़ से घबराये लोगों में धर्म की स्वयंसिद्ध सामाजिकता और राजनीति की सर्वव्यापी प्रासंगिकता दोनों को इनकारने का भाव पैदा हुआ है। प्रायः पढे़-लिखे मध्यम वर्गीय लोग अपने अराजनीतिक होने की दावे को बड़े गर्व से पेश करते हैं, जबकि अराजनीतिक होना अंततः राजनीतिक यथास्थिति का समर्थन करता है, परिवर्तन को रोकता है। अन्याय के प्रति मौन और तटस्थ बनाता है। ऐसे पढे़-लिखे लोगों का समझदार होने का दावा दुखों से जूझ रहे करोड़ों लोगों को अस्वीकार है। दूसरी तरफ, जन्म से लेकर मृत्यु तक हर मोड़ पर धर्म के द्वारा बनी परम्पराओं, संस्कारों और कर्मकांड के बीच जीने के सच के बावजूद आधुनिकता की दुनिया में जीने वाले लोग बड़ी मासूमियत से यह यकीन करते पाये जाते हैं कि उनका धर्म से कोई वास्ता नहीं रह गया है, क्योंकि वह नवरात्र का व्रत या रमजान के रोजे नहीं रखते हैं। निश्चित तिथियों से जुड़ी तीज-त्योहारों को वे नहीं मानते। तीर्थ यात्राओं के बजाय आनंद, विलास विहार के केंद्रों जैसे हांगकांग, सिंगापुर, हाॅलीवुड आदि में ज्यादा रुचि रखते हैं।

क्या धर्म और राजनीति का तामसिक संगम सिर्फ सत्ता के पायों को ही मजबूत करता है या यह लोक के लिए भी कोई जगह मुहैया कराता है, जिससे कि राष्ट्र निर्माण को मजबूती मिल सके?     
           हम इसे गांधी के धार्मिक विश्वास से समझते हैं। गांधी का रास्ता आधुनिक दौर की विडम्बनाओं से जूझते हुए बना है। इसमें सव-धर्म उदासीनता की बजाय सर्वधर्म-समभाव का आग्रह है। एकल सत्ता के बजाय लोकशक्ति और लोकसंघ में योगदान की प्रतिबद्धता है। स्वधर्म की प्रतिष्ठा की आड़ में अन्य मतावलम्बियों के साथ भेदभाव और दुव्र्यवहार का निषेध है। देशकाल और पात्र से उपर उठकर सभी धर्मों के श्रेष्ठ तत्वों के निरंतर स्मरण और सचेत अनुकरण की जीवनशैली है। इसमें पूरे दुनिया के मुक्तिकामियों ने अनुकरणीय समाधान माना है। अमेरिका के ईसाई धर्मगुरु मार्टिन लूथर किंग से लेकर तिब्बत के बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा तक ने इसे अपनाया है। इसी तरह से दक्षिण अफ्रीका के मार्कसवादी क्रांतिकारी नेलसन मंडेला से लेकर म्यांमार की लोकतांत्रिक क्रांति की नायिका आंग सान सू ची तक इसमें प्रकाश पा चुके हैं। लेकिन, यह आधुनिक जीवन की दो मूल प्रवृत्तियों के निषेध के कारण फिलहाल भारत के राजनेताओं और धर्मगुरुओं दोनों के लिए अस्वीकार्य है। गांधी का धर्म और राजनीति सम्बंधी मानव केंद्रित सात्विकता का रास्ता धर्मगुरुओं के रीति-रिवाजों का निषेध करता है। गांधी का राम मंदिरों में अपार सम्पत्ति संचित कर रहे पंडे-पुजारियों का राम नहीं है। इसमें धर्म परिवर्तन के लिए कोई आग्रह नहीं है। इसमें दरिद्र नारायण ही दुनिया का सबसे बड़ा देवता है। फिर गांधी के मार्ग में भोगवाद का पूर्ण निषेध है। अब अगर भोगवाद की अनुमति नहीं है, तो राजनीति में कौन कूदना चाहेगा। अगर राजनीति रचना और संघर्ष के दो पहियों पर चलने वाला महायान है, तब सत्ता के लिए राजनीति का चोला पहनने वालों को इसमें कहां से आनंद मिलेगा। लेकिन, आज इस दुनिया में वसुधैव कुटुम्बकम का भाव ही एक मात्र निदान है। देश के सुदूर कोनों में घटने वाली शर्मनाक घटनाएं सबका सरोकार बन चुकी हैं। इसमें धर्म और राजनीति का तामसिक संगम सबसे खतरनाक माना जा रहा है। इससे तात्कालिक सफलता मिलने की गारंटी है, तो दीर्घकालीन अमिट कलंक का भी सच जुड़ा हुआ है। आज धर्म और राजनीति का गलत संयोग करके सत्ता पाना अधर्म और असामाजिकता का सबसे निंदनीय उदाहरणा बन चुका है। इसलिए तात्कालिकता के आवेग के बावजूद हमें कालचक्र के महासत्य का ध्यान रखना होगा। सांप्रदायिकता की राजनीति से सीटें जीती जसकती हैं, सरकार भी बनायी जा सकती है, लेकिन राष्ट्र-निर्माण असम्भव है, सभ्यता का विकास तो हो ही नहीं सकता। 

Sunday, December 7, 2014

हाशिम अंसारी के कथनों के निहितार्थ

अयोध्या में 6 दिसम्बर, 92 को हुए ध्वंस की बरसी पर कृष्ण प्रताप सिंह की टिप्पणी...


Krishna Pratap Singh


किसी ने कहा, कौआ कान ले गया और आप कान को भूलकर कौए के पीछे दौड़ पड़े! अयोध्या मामले  में अर्धसत्यों के सहारे अपनी ‘राजनीति’ चमकाने वाले एक बार फिर कुछ ऐसा ही करते दिख रहे हैं। इस बार बहाना है, मामले के वादी हाशिम अंसारी का उसकी पैरवी से हट जाने, रामलला को आजाद देखने की इच्छा जताने और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा करने वाला बयान जो इस कारण भी कुछ ज्यादा सनसनीखेज लग रहा है कि 6दिसम्बर,1992 के ध्वंस की 22वीं बरसी के मौके पर आया है। कई भाई हाशिम के इस ‘आत्मसमर्पण’ या कि ‘हृदयपरिवर्तन’ से खासे गदगद हैं। इतने कि उन्हें ‘धन्यवाद’ दे रहे हैं कि उन्होंने एक झटके में ‘वहीं’ राममन्दिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया!
         दुर्भाग्य से इन भाइयों को मालूम नहीं कि न हाशिम ने आत्मसमर्पण किया है, न ही उनका हृदयपरिवर्तन हुआ है। उसूलन वे पहले जैसे ही हैं और उनकी रामलला को आजाद देखने की चाह को तभी समझा जा सकता है, जब जाना जाये कि उनकी अयोध्या में ही गुजरी 92 वर्ष लम्बी जिन्दगी में बाबरी मस्जिद का वादी होने के बावजूद, उसकी जगह राममन्दिर बनाना चाहने वालों की धार्मिक भावनाओं के अनादर की एक भी मिसाल नहीं है। हाशिम शुरू से ही इस विवाद के राजनीतिकरण के विरुद्ध और उसको अदालती फैसले या बातचीत से हल करने के पक्षधर रहे हैं। इसीलिए अपने प्रतिवादी परमहंस रामचन्द्रदास से उनकी मित्रता में कभी कोई खटास नहीं आयी। अटल जी के राज में परमहंस का निधन हुआ तो हाशिम ने रोते हुए कहा था कि अब वे ‘बहुत अकेले’ हो गये हैं। राजनीतिक दल लगातार समस्याएं नहीं खड़ी करते रहते तो कौन जाने हाशिम व परमहंस स्थानीय लोगों के साथ मिलकर सारे विवाद का किस्सा ही खत्म कर देते।  

Hashim Ansari
            हाशिम अरसे से कहते आ रहे हैं, ‘22-23 दिसम्बर, 1949 की रात रामलला को साजिशन बाबरी मस्जिद में ला बैठाया गया, तो हमने उनकी शान में कोई गुस्ताखी नहीं की। न उन्हें हटाने की कोशिश, न उनके मर्यादाभंग का प्रयास। गुस्से में आकर उनका वह ‘घर’ भी हमने नहीं ढहाया। आज वे जिनके कारण तिरपाल में हैं, वे महलों में रह रहे हैं। उन्हें इलायचीदाना खिलाकर खुद लड्डू खा रहे हैं। ऐसा कब तक चलेगा? रामलला को आजादी मिलनी ही चाहिए।’
             हाशिम ने उनकी आजादी के जतन 30 सितम्बर, 2010 को आये इलाहाबाद उच्चन्यायालय के विवादित भूमि के तीन टुकड़े करके पक्षकारों में बांट देने वाले फैसले के बाद भी किये थे। हनुमानगढ़़ी के महंत ज्ञानदास के साथ मिलकर, कहते हैं कि, वे समाधान के निकट तक पहुंच गये थे और कह दिया था कि सर्वोच्च न्यायालय में अपील नहीं करेंगे। लेकिन ज्ञानदास की मानें तो अशोक सिंघल और विनय कटियार आदि ने ऐसा फच्चर फंसाया कि जीते व पराजित महसूस कर रहे दोनों पक्ष सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गये। 
               अब हाशिम के पैरवी से हटने के निश्चय के पीछे महज उनका स्वास्थ्य है। हृदयाघात के बाद अभी हाल में ही उन्हें पेसमेकर लगा है। एक पैर जख्मी है सो अलग। वे जानते हैं कि उनके पैरवी न करने से सम्बन्धित मुकदमा वापस या खत्म नहीं हो जाने वाला। सेन्ट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड व अन्य पैरवीकार अपना काम करेंगे ही। प्रतिनिधिक चरित्र के मुकदमे यों भी बीच में छोड़े या वापस नहीं लिये जा सकते। फिर, कोई भी अन्य व्यक्ति ऐसी कोशिश से खुद को प्रभावित बताकर उन्हें जारी रखने को आगे आ सकता है। 
               फिर हाशिम को ‘धन्यवाद’ देने वालों को समझना चाहिए कि राममन्दिर निर्माण का रास्ता साफ करने या उसमें बाधा डालने का काम वे कर ही नहीं सकते क्योंकि अब इस मामले में सब कुछ भारत की सरकार व संसद की इच्छा पर निर्भर है। संसद द्वारा विवाद के सिलसिले में 1993 में बनाये गये अयोध्या सरटेन एरिया एक्वीजीशन एक्ट में प्रावधान है कि अधिग्रहीत भूमि पर राममन्दिर, मस्जिद, संग्रहालय, वाचनालय और जनसुविधा के लिए स्नानागार व शौचालय समेत पांच निर्माण होंगे। इसमें सरकार व संसद की इच्छा के बगैर परिवर्तन संभव नहीं है क्योंकि कानून बनाने या बदलने का अधिकार किसी और के पास नहीं। सम्बन्धित पक्ष सुलह भी कर लें तो सरकार की सहमति के बिना उसे लागू नहीं करा पायेंगे। 
               इसलिए अब मुस्लिम पक्ष ने अन्यों की पहल पर समझौतावार्ताओं से तौबा कर ली और तय किया है कि सरकार की ओर से कोई सार्थक समाधान प्रस्ताव आयेगा तो उसी पर विचार करेगा। उसके अनुसार सरकार की जिम्मेदारी है कि वह दोनों पक्षों को स्वीकार्य समाधान तलाशे। लेकिन यही बात कहते हुए हाशिम ने नरेन्द्र मोदी द्वारा अपने चुनाव क्षेत्र में बुनकरों के हित में उठाये गये कुछ कदमों की प्रशंसा कर दी तो उसके भी तरह-तरह के अर्थ निकाले जाने लगे। हाशिम को साफ करना पड़ा कि इसका अर्थ यह नहीं कि वे मन्दिर मस्जिद मामले में भी मोदी के समर्थक हो गये हैं। हां, उन्होंने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाये जाने के बाद से ही इस मामले को तूल देने से जैसा परहेज रखा है, उससे थोड़ी उम्मीद बंधती है कि विहिप के बड़बोले नेताओं द्वारा मन्दिर निर्माण के लिए कानून बनाने के दबाव से पार पाकर वे विवाद के सार्थक समाधान का प्रयास करेंगे। करते हैं तो उनकी राह क्यों रोकी जाये? 
                लेकिन आजम खां कहते हैं कि हाशिम डर गये हैं। कई अन्य लोगों को उनके नये कथनों को किसी ‘डील’ का नतीजा बताने से भी गुरेज नहीं है। लेकिन हाशिम का डरने या डील करने का कोई ज्ञात इतिहास नहीं है। यकीनन, उनके कथनों में उनके रोष, क्षोभ, खीझ, गुस्से, थकान और निराशा को भी पढ़ा जाना चाहिए। हाशिम इसे छिपाते भी नहीं हैं। कहते हैं कि इस लड़ाई में उन्हें अपनों व परायों से हर कदम पर दगा ही मिला। उन्हीं के शब्दों में ‘जो आजम कभी बाबरी मस्जिद ऐक्शन कमेटी में थे, अब मंत्री हैं तो उन्हें विवादित परिसर में मन्दिर ही मन्दिर नजर आता है, मस्जिद दिखती ही नहीं। मैं उनसे इसके सिवा क्या कहूं कि जब मस्जिद दिखती ही नहीं है तो उसके लिए लड़ाई का ढोंग करके लोगों को उल्लू बनाना बंद करें।’
              सोचिए जरा, हाशिम की दगा वाली टिप्पणी किसके खिलाफ है? सिर्फ उस पत्रकार के, जिससे उन्होंने कहा कि शारीरिक असमर्थता के कारण वे छः दिसम्बर को घर पर ही रहेंगे तो उसने इसको यौम—ए—गम के आयोजन से दूर रहने के उनके निश्चय के रूप में लिया या फिर संविधान, न्यायपालिका व सरकार के  खिलाफ भी, 65 साल लम्बी अदालती लड़ाई में जिनके द्वारा उन्हें और दिवंगत परमहंस को इंसाफ नहीं दिलाया जा सका! यह उनका आत्मसमर्पण है, तो किसके लिए ज्यादा लज्जाजनक है?  

Friday, November 21, 2014

धर्म की खोखली बुनियादों में दबी स्त्री

संस्कृति, परंपरा, आदर्श, तहज़ीब, रीति रिवाज़ और शरियत जैसे बड़े वज़नदार शब्द सुनने में बड़े अच्छे लगते हैं। और ये भी कि इनको शिद्दत से मानना चाहिए और इनका पालन करना चाहिए जिससे समाज में कोई बुराई जड़ न कर जाए। मगर यही शब्द कभी कभार जड़ता का रूप लेकर इंसानी ज़िंदगी में सड़ांध पैदा करने लगते हैं और इन शब्दों की आवाज़ तब इतनी बदबूदार हो जाती है कि इंसान अपने कान सिकोड़ने लगता है। ऐसे शब्दों को नहीं सुनना चाहता। क्यों?


            उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में एक कस्बा है बहादुरगंज। वहां मुसलमानों की अक्सरियत है। हिंदू विरादरी भी है लेकिन बहुत कम। मुस्लिम बहुल इलाका होने की वजह से वहां इस्लामी तहजीब की झलक चारों तरफ दिखाई देती है, मगर वह तहजीब सिर्फ बाहरी आवरण भर है। उस तहजीब की बेरंग सूरतें तो उस आवरण के भीतर मौजूद हैं। और विडंबना देखिए कि इन सूरतों में एक भी सूरत किसी पुरूष की नहीं है। पुरूष सत्तात्मक इस समाज ने औरत के पैरों में धर्म और परंपरा की बेड़ियां डालकर उन्हें किस तरह तड़पने पर मजबूर कर दिया है, इसकी बानगी उस कस्बे के घरों की खिड़कियों से असहाय झांकते उन अबला चेहरों को पढ़कर देखा जा सकता है। वो चेहरे हैं उन लड़कियों के जिन्हें शादी के बाद या तो छोड़ दिया गया है या तलाक दे दिया गया है। उस कस्बे में 50 प्रतिशत ऐसी लड़कियां हैं, एक घर में चार लड़कियों में से दो लड़कियां तलाकशुदा हैं या उन्हें उनके पतियों द्वारा प्रताड़ित कर छोड़ दिया गया है। समाज के लोकलाज से डरी सहमी, अवसादग्रस्त ये लड़कियां अपने मायके में अपने छोटे बच्चों को लेकर किसी कैदी की तरह कैद हैं। भरी जवानी में तलाक का दंश झेल रही इन लड़कियों की पहाड़ सी जिंदगी सिर्फ अल्लाह मियां के भरोसे कैसे कट रही है, इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है। और गरीब मां बाप के पास इतना पैसा नहीं कि वो अपनी बेटियों की मान मर्यादा के लिए केस लड़ सकें।

       कबीर दास जी कहते हैं ‘‘खाला घरे बेटी ब्याहे, घरहीं में करे सगाई।’’ उन लड़कियों के हालात के मद्देनजर इन पंक्तियों की प्रासंगिकता यह है कि मुसलमानो में चार शादियां जायज हैं लेकिन इन चार शादियों के लिए कैसी कैसी कितनी सूरतें हैं, ये ज्यादातर मुसलमान या यूं कहें तो ज्यादातर मुसलमान इसे नहीं जानते। और शरियत ये कि दूध के रिश्ते को छोड़कर किसी भी लड़की से शादी जायज मानी जाती है। ऐसी स्थिति में चाचा, मामा, बुआ, मौसी की लड़की या गांव की किसी और हमबिरादर लड़की से वहां का कोई भी लड़का शादी कर सकता है। इस्लामी शरीयत और तहजीब के चश्में से देखें तो यह अच्छा लग सकता है, लेकिन जब इसके सामाजिक परिणाम को देखते हैं तो गुस्सा फूट पड़ता है।

       दरअसल इसके पीछे एक जबरदस्त कारण है मुस्लिमों का अशिक्षित होना। मुसलमानों में साक्षरता की दर बहुत ही कम है। अगर वो पढ़ते भी हैं तो सिर्फ अपनी धार्मिक किताबों और शरीयत को ही पढ़ते हैं। इनके अंदर दुनिया, समाज की समझदारी कम है और रूढ़िवादिता, कट्टरता ज्यादा है, जिसके परिणाम स्वरूप चार शादी को जायज मानकर तीन को तलाक देकर उनकी जिंदगी बद से बदतर बनाने जैसा घृणित काम करते हुए ये बिल्कुल नहीं सकुचाते, बल्कि ये कहते हैंदृ हम धर्म पे हैं क्योंकि हम जायज पे हैं। मगर तलाक के बाद की नाजायज होने वाली चीजें ये नहीं समझ पाते। यहां तक कि एक घर में जिसने तीन शादियां कर सबको छोड़ दिया है उसी की तीन बहने तलाक लिए बैठी हैं। अब आप सोच सकते हैं कि जहां इस तरह की तहजीब होगी वहां का माहौल क्या होगा? एक तो इनमे शिक्षा की वैसे ही कमी है, दूसरे दारूल ओलूम के मुफ्ती मुल्ला रोज़ कोई न कोई फतवा देते रहते हैं। अभी पिछले दिनो एक फतवा आया था कि ‘‘ मुस्लिम महिलाओं का मर्दों के साथ काम करना गैरइस्लामी है।’’ क्या ये बताएंगे कि तलाक देकर या छोड़कर उन लड़कियों की जिंदगी बरबाद करना कितना इस्लामी है, जिनकी गोद में एक दो बच्चे हैं। ये ओलमा बहादुरगंज या उस जैसे सैकड़ों गांवों और कस्बों की लड़कियों, औरतों के हालात पर क्यों कुछ नहीं बोलते? क्या सारे फतवे औरतों के लिए है, मर्दों के लिए कुछ नहीं? क्या इन्हें इन सब बातों का इल्म नहीं? है। क्योंकि बहादुरगंज जैसे सैकड़ों गांवों और कस्बों के कुछ लोग ही सही उसी दारूल ओलूम में पढ़ाई करते हैं। 


             ये सारे ओलमा भी एक तरह से सत्ताभोगी हैं, जो धार्मिक लबादा पहने अपने मतलब की शरई सियासत करते हैं। मुसलमान गरीब हैं, अशिक्षित हैं, बेरोजगार हैं और लाचार हैं मगर इन मुल्लाओं को इनकी चिंता नहीं है। ये तो बस तब्लीग की दावत देते हैं और बड़ी बड़ी किताबी, शरई बातें करना जानते हैं। ये हाईटेक ओलमा अपनी दुकान चलाने के लिए टीवी पर आकर सानिया मिर्जा की शादी पर और उसके स्कर्ट पर तो ख़ूब बोलते हैं, मगर उन अबलाओं, तलाकशुदा लड़कियों की जिंदगी को देखते हुए, जानते हुए भी कुछ नहीं बोलते। हिन्दुस्तान में आज ज्यादातर मुसलमानो को ये नहीं पता कि मानवाधिकार क्या है? महिला आयोग क्या है? ये खुद के लिए भी कोई कानूनी लड़ाई से डरते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप हमेशा दबे कुचले रहते हैं। लेकिन इसके साथ ही साथ इनमे कट्टरता ऐसी है कि अपने नजदीकी मस्जिदों में नमाज भले न पढ़ें मगर बाबरी मस्जिद बनवाकर वहां नमाज पढ़ने की ख्वाहिश पाल रखे हैं।

       देखा जाए तो मुसलमानो के लिए हिन्दुस्तान से सुरक्षित जगह पूरी दुनिया में कहीं नहीं, लेकिन फिर भी अपने आस पड़ोस की बुराईयों को नजरअंदाज कर दूसरे मुल्कों के मुसलमानों की हालत पर तरस खाकर कहते हैं—‘‘हमें सताया जा रहा है।’’ इन तमाम मौलवी, मुफ्ती, मुल्लाओं को ये सोचना चाहिए कि मुसलमानो में शिक्षा का विस्तार कैसे हो, तभी बहादुरगंज जैसी जगहों पर लड़कियों के साथ हो रहे इन अत्याचारों को रोका जा सकता है। और एक जायज़ समाज का निर्माण किया जा सकता है।  

       स्त्री को जननी कहा जाता है, मगर बाइबिल के मुताबिक ईश्वर ने सबसे पहले एक पुरुष आदम को बनाया और फिर आदम की तरह स्वतंत्र श्रृजन न करके उसी पुरुष की बाईं पसली से एक स्त्री हव्वा को बनाया। जिसे हम अर्धांगिनी की संज्ञा देते हैं। आज भले ही हम स्त्री को आधी दुनिया का दर्जा देकर उसको पुरुष के बराबर हक देने की बात करें लेकिन पुरुष रुपी ईश्वर की सत्ता ने सबसे पहले एक पुरुष को पैदा कर और उसकी बाईं पसली से एक स्त्री को पैदा कर एक पुरुष सत्तात्मक संरचना की नींव डाली, जिसके परिणाम स्वरूप हमारा समाज एक पुरुष सत्तात्मक समाज कहलाने लगा। हिन्दू देवी देवताओं में सर्वपरि ब्रम्हा, विष्णु, महेश भी पुरुष देवता हैं। हालांकि, इनसे कुछ अलग तरह से मुसलमानों की धार्मिक किताब क़ुरान में आता है कि आदमी और औरत के लिए अल्लाह ने फरमाया- ‘मैंने तुम दोनों को एक ही चीज से बनाया है, लेहाजा तुम दोनों एक-दूसरे पर बरतर नहीं हो।’ सच क्या है पता नहीं। लेकिन अगर इन सभी मान्यताओं को के हिसाब से देखा जाए तो हमारी धार्मिक मान्यताओं मे स्त्री के उपेक्षित होने के लिए ईश्वर ही दोषी है। शुरू से ही पुरुष खुद को सबला मानता रहा है और स्त्री को अबला। स्त्री के उपेक्षित होने एक वृहद और प्राचीनतम इतिहास है। तभी तो हम दिन पर दिन आधुनिक होते जा रहे हैं फिर भी हमारी मानसिकता जस की तस, वहीं की वहीं है। अगर हमें उनको पुरुष जैसा हक देना है तो सबसे पहले उस इतिहास को भूलकर पुरुष मानसिकता में बदलाव लाना होगा। जो अभी संभव नहीं लग रहा। 

        छठवीं शताब्दी में मुसलमानों के आखिरी पैगम्बर मुहम्मद साहब जब मक्का में पैदा हुए तो उनके जमाने में लड़कियों, स्त्रियों पर तरह तरह के जुल्म ढाए जाते थे। पैदा होते ही लड़कियों को ज़िंदा जमीन में दफना दिया जाता था, वो इसलिए कि उनको अपनी नाक प्यारी थी। मुहम्मद साहब ने इस कुप्रथा को खत्म किया और इस्लाम धर्म की स्थापना की। मगर उसी इस्लाम ने मर्दों के लिए चार शादी जायज मानकर तलाक की ऐसी व्यवस्था दी जिसमें अगर एक मर्द किसी औरत को तलाक देता है और यदि फिर उसे अपनाना चाहता है तो उस औरत को पहले किसी और मर्द से निकाह करना होगा और फिर उस निकाह को तोड़कर अपने पहले पति से निकाह कर सकेगी। चार शादी सिर्फ मर्दों के लिए, यह एक स्त्री संवेदना के साथ खिलवाड़ सा लगता है। सीता की अग्नि परीक्षा से लेकर सती प्रथा तक में सिर्फ स्त्री ने ही अपने शरीर और संवेदनाओं की बलि दी है। 

        जिस समाज में एक पुरूष कई स्त्रियां रख सकता हो मगर वहीं एक स्त्री कई पुरूष नहीं रख सकती हो और साथ ही स्त्री के लिए विधवा विवाह वर्जित हो उस समाज में नारी के अधिकार रुपी कोमल स्वरों पर पुरुष सत्तात्मक दुगुन तिगुन के आघात से पैदा एक मानसिक अतिवाद का सरगम ही तो है जिसे पुरुष अपना दंभ समझकर गाता फिर रहा है।

        उत्तर प्रदेश, हरियाणा, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों में सगोत्र विवाह के खिलाफ उठ खड़ा हुईं सर्वखाप पंचायतें भी इसी मानसिक अतिवाद का नतीजा हैं। इन पंचायतों में सिर्फ पुरुष भाग लेते हैं, चाहे मसला भले ही किसी स्त्री से जुड़ा हो। जिस पंचायत में महिलाओं की कोई भागीदारी नहीं वहां कैसा फैसला हो सकता है ये समझना बहुत आसान है। ये कैसी विडम्बना है रूढ़िवादिता और धर्म की सगोत्र विवाह की सजा के नाम पर उस लड़की के साथ पहले सामुहिक बलात्कार और फिर हत्या जो उनके गांव और गोत्र के ही हैं, जिन्हें पंचायतें भाई बहन तक मानती हैं।

       18 जून 2010 को दिल्ली हाई कोर्ट ने नरेश कादियान के हिन्दू विवाह अधिनियम में संशोधन कर गोत्र शादियों पर प्रतिबंध लगाने की जनहित याचिका को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति शिवनारायण ढींगरा व न्यायमूर्ति एके पाठक की खंडपीठ ने सुनवाई में याची से पूछा कि गोत्र क्या होता है? याची ने कहा, यह हिन्दू मान्यता है। कोर्ट ने इस मान्यता के तर्क को खारिज करते हुए कहा, किसी भी हिन्दू ग्रंथ में इस प्रकार के विवाह पर प्रतिबंध के बारे में नहीं लिखा गया है और ना ही कोई मान्यता है। जाहिर सी बात है ये परंपरायें,मान्यताएं किसी विशेष देश काल का परिणाम हैं जिन्हें आज के परिप्रेक्ष में देखना सरासर अनुचित है। इन मान्यताओं का कोई प्रमाणिक धर्मग्रंथ या शाष्त्र नहीं है। 


        दरअसल गोत्र का ये मसला सिर्फ गोत्र का नहीं लगता। इस गोत्रीय मान्यता की आड़ में ये सवर्ण पंचायतें दलितों, गरीबों में पनप रहे प्रेम और आधुनिकता को फूटी आंख नहीं देखतीं। इन पंचायतों के सदस्य रसूख वाले होते हैं जहां सिर्फ उन्ही की मरजी चलती है। यह परंपरा का ढोंग ही तो है जो सामुहिक बलात्कार करते समय ये नहीं सोच पाते कि वो लड़की उन्ही के गांव की उन्ही की बहन है। जाहिर है परंपरा, मान्यता या आडम्बर के बीच किसी सोच के लिए कोई जगह नहीं बचती। ये 21वीं सदी के भारत का विभत्स चेहरा है जहां एक तरफ तो आधुनिक होने की बात की जाती है तो दूसरी तरफ स्त्रियों का मानसिक, शारीरिक शोषण किया जाता है और उनकी संवेदनाओं पर रूढ़िगत परंपराओं का कुठाराघात किया जाता है। ये वो भारत नहीं लगता जहां नारी को शक्ति का रूप कहा जाता है और उसकी पूजा की जाती है। 

       एक पंक्ति है— ‘‘ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी। ये सब ताड़न के अधिकारी।।’’ इस लाइन में कवि ने नारी को भी ताड़न का अधिकारी मानकर एक वैचारिक भूल की थी जिसे हम आज तक ढो रहे हैं। वह कवि भी पुरुष था जिसने अपने दंभ का परिचय देकर नारी पुरुष के बीच एक लकीर खींच दी। तमाम रूढ़िगत परंपराओं को दरकिनार कर आधुनिक मानसिकता से इस खाई को पाटने की जरूरत है तभी स्त्री को पुरुष जैसा अधिकार मिल सकेगा।

Wednesday, October 15, 2014

किसकी देन है इस्लामिक आतंकवाद?

Subhash Gatade
एसोसिएटेड प्रेस के लिए लिखी अपनी लेखों की शृंखला के लिए पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित पत्रकार एडम गोल्डमैन तथा माट अपुजो इन दिनों बेहद खुश होंगे। दरअसल, न्यूयार्क पुलिस महकमे द्वारा चलाए जा रहे विवादास्पद मुस्लिम जासूसी कार्यक्रम का सबसे पहले उन्होंने भंडाफोड़ किया था और अब खबर आई है कि न्यूयॉर्क शहर के पुलिस विभाग ने अपनी विवादास्पद हो चुकी जासूसी इकाई ‘डेमोग्रेफिक यूनिट’ को अंतत: बंद करने का निर्णय लिया है जो मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाकर काम करती थी। न केवल उसके एजेंट मुस्लिम छात्र समूहों का हिस्सा बनते थे, मस्जिदों में अपने नुमाइंदों को भेजते थे, रेस्तरां, जिम या सैलून में जारी बातचीत को गुपचुप टेप करते थे और इसी के आधार पर सूचनाओं का विशाल भंडार संग्रहित करने में लगे थे। सालों तक इन सूचनाओं को एकत्रित करने के बाद भी वह आतंकवाद को लेकर एक अदद मामले में सूत्र देने में नाकामयाब रहे। अंतत: उसने स्वीकार किया कि समुदाय विशेष को निशाना बनाकर चलाई गयी गतिविधियों में उन्हें आतंकवाद को लेकर कोई सूत्र नहीं मिल सके।
           इसे महज संयोग कहा जा सकता है कि बदनाम हो चुकी न्यूयॉर्क पुलिस की इस विवादास्पद योजना को लेकर निर्णय तभी सामने आया है, जबकि हम तमिलनाडु पुलिस द्वारा ‘आतंकवादी निर्माण’ में निभायी भूमिका को लेकर नए तथ्यों से रू-ब-रू  http://www.newindianexpress.com/states/tamil_nadu/Informer-Cop-Nexus-Behind-TN-Islamic-Fundamentalism/2014/04/11/article2161711.ece
  हैं। वैसे कितने लोगों को जनाब लालकृष्ण आडवाणी की तमिलनाडु की 2011 की यात्रा में उनके रास्ते में बरामद किए गए पाइप बम का किस्सा याद है? मदुराई में हुई इस घटना को लेकर अल्पसंख्यक समुदाय के दो लोगों को पकड़ा गया था और तमिलनाडु पुलिस ने यह दावा किया था कि उसने इस्लामिक अतिवादियों के एक बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश किया है।
          फिलवक्त तमिलनाडु की उच्च अदालत में प्रस्तुत याचिका – जिसमें ऐसे तमाम बम धमाकों की उच्चस्तरीय जांच की मांग की गई है, पर तथा उसके लिए सबूत के तौर पर प्रस्तुत रिटायर्ड पुलिस अधीक्षक द्वारा भेजे गए गोपनीय पत्रों पर गौर करें तो एक अलग ही तस्वीर सामने आती है, जो मुस्लिम पुलिस मुखबिरों एवं गुप्तचर अधिकारियों के बीच मौजूद अपवित्र गठबंधन की तरफ इशारा करती है और उसी गठबंधन को इलाके में फैले इस्लामिक अतिवादी गतिविधियों का स्रोत बताती है। कुछ समय बाद ही न्यायमूर्ति सुबैया की अदालत इस याचिका को लेकर तथा इसमें पेश सबूतों पर गौर करने वाली है।
          गौरतलब है कि मदुराई जिले के पूर्व पुलिस अधीक्षक वी. बालाकृष्णन द्वारा इन गोपनीय पत्रोंं को डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस और अतिरिक्त डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस के नाम मार्च 2013 तथा अगस्त 2013 में अनुक्रम से भेजा गया था। अप्रैल माह के दूसरे सप्ताह में उच्च अदालत के सामने इन पत्रों को पेश किया गया। याचिकाकर्ता के वकील पीटर रमेश द्वारा मदुराई में हुए तमाम बम धमाकों की सीबीआई जांच की मांग की गई है। 29 मार्च 2013 को भेजे गए पत्र में पुलिस अधीक्षक महोदय ने सबूत पेश करते हुए कहा है कि किस तरह दो अभियुक्तों  सैयद वहाब और इस्मथ, दोनों के खिलाफ अवनीयापुरम पुलिस स्टेशन ने फिरौती का मामला दर्ज किया था- उसके चन्द रोज बाद ही इस मामले में भी उन्हें अभियुक्त बनाया गया, किसी विजय पेरूमल नामक हेडकांस्टेबल का उल्लेख करते हुए – जो मदुराई की सिटी इंटेलीजेंस विंग से जुड़ा है – पत्र में यह भी लिखा गया है कि किस तरह उसने वहाब के साथ मिलकर रियल इस्टेट के कुछ विवादास्पद मसलों में मध्यस्थता की थी और उन्हें निपटाया था।
           पुलिस अधीक्षक महोदय ने अगस्त 2013 में एक अन्य गोपनीय पत्र अतिरिक्त डीजीपी को भी भेजा था, जिसमें मन्दिरों की इस नगरी में इस्लामिक अतिवादियों द्वारा कथित तौर पर बम रखने की घटनाओं की जांच में मुब्तिला स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम के एक इंस्पेक्टर के तबादले का विरोध किया गया था। याचिकाकर्ता के वकील का कहना था कि यह घटनाएं इसी बात का प्रमाण पेश करती हैं कि किस तरह भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से ही ऐसी घटनाएं हो रही हैं और उन्हीं की दखलंदाजी के कारण असली मुजरिम पकड़े नहीं जा सके हैं।
          निश्चित ही गुप्तचर अधिकारियों या पुलिस के लोगों द्वारा मुखबिरों के इस्तेमाल का यह कोई पहला प्रसंग नहीं है। याद कर सकते हैं कि मालेगांव 2006 का शबे बारात के दिन का वह बम विस्फोट, जिसमें कई निरपराध लोग मारे गए थे और इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हुए कई मुस्लिम युवकों को छह साल से अधिक वक्त जेल की सलाखों के पीछे गुजारना पड़ा था। इस पूरे प्रसंग में अबरार अहमद नामक एक व्यक्ति की ‘गवाही’ सबसे अहम मानी गई थी, जो उस वक्त पुलिस के लिए काम करता था। बाद में उसने शपथपत्र देकर यह बताया कि किस तरह उसी ने इन लोगों को फंसाया है। इसके बावजूद उन निरपराधों को जेल से बाहर निकलने तथा उन पर लगाए गए मुकदमे समाप्त होने में दो साल से अधिक वक्त लगा था। एक क्षेपक के तौर पर यह बताया जा सकता है कि इस अपराध के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक असीमानंद तथा अन्य हिंदुत्व आतंकवादियों पर मुकदमे कायम हो चुके हैं।
          अभी पिछले ही साल प्रख्यात खोजी पत्रकार आशीष खेतान द्वारा डब्लू डब्लू डब्लू गुलैल डाट कॉम पर प्रस्तुत रिपोर्ट भी महत्त्वपूर्ण है, जिसमें इस बात का दस्तावेजीकरण किया गया है कि ‘गोपनीय फाइलें इस तथ्य को उजागर करती हैं जिसका मुसलमानों को पहले से संदेह रहा है : यही कि राज्य जान-बूझकर निरपराधों को आतंकवाद के आरोपों में फंसा रहा है।‘ जबकि इलाकाई मीडिया में या उर्दू मीडिया में इस रिपोर्ट को काफी अहमियत मिली, मगर राष्ट्रीय मीडिया ने एक तरह से खेतान के इस खुलासे को नजरअंदाज किया कि किस तरह आधे दर्जन के करीब आतंकवाद विरोधी एजेंसियों के आंतरिक दस्तावेज इस बात को उजागर करते हैं कि राज्य जान-बूझकर मुसलमानों को आतंकी मामलों में फंसा रहा है और उनकी मासूमियत को परदा डाले रख रहा है।
          पत्रकार ने ‘आतंकवाद केंद्रित तीन मामलों की-7/11 ट्रेन बम धमाके, पुणे; पुणे जर्मन बेकरी विस्फोट और मालेगांव धमाके 2006 की जांच की है और पाया है कि इसके अंतर्गत 21 मुसलमानों को यातनाएं दी गईं, अपमानित किया गया और बोगस सबूतों के आधार पर उन पर मुकदमे कायम किए गए। जब उनकी मासूमियत को लेकर ठोस सबूत पुलिस को मिले, तब भी अदालत को गुमराह किया जाता रहा।’
          हमारे अपने वक्त में सूबा गुजरात आतंकवादियों की बरामदगी के बारे में नए-नए रिकॉर्ड कायम कर चुका है।  गुजरात पुलिस विभाग के डीआईजी बंजारा के नेतृत्व में तो ऐसे तमाम ‘आतंकवादियों’ को पकड़कर पुलिस ने मार गिराया, जिनके बारे में कहा गया कि यह लोग मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को मारने के लिए पहुंचे थे। उदाहरण के लिए जिन दिनों बंजारा डीआईजी पद पर विराजमान थे, उन दिनों मोदी सरकार द्वारा ‘आतंकवाद विरोध’ के नाम पर तय की गई कार्रवाई योजना/एक्शन प्लान का खुलासा हुआ था, इसका स्वरूप ऐसा था कि गुजरात पुलिस की इस योजना ने प्रदेश के धार्मिक अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों को नए सिरे से आतंकित किया था।
          बंजारा के कार्यकाल में 9 मुठभेड़ों में पंद्रह लोग मारे गए थे। सोहराबुद्दीन शेख-कौसर बी के फर्जी एनकाउंटर में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप में जब विशेष कार्य बल ने जांच की तो यह बात सामने आई कि किस तरह मेडल और ट्राफियां बटोरने के लिए जनाब बंजारा और गुजरात एवं राजस्थान पुलिस के उनके समानधर्मा अफसरों ने ऐसे कई कांडों को अंजाम दिया था।
           इन्हीं मुठभेड़ों में एक चर्चित किस्सा था मार्च 2003 में गुजरात पुलिस के हाथों मारे गए एक साधारण शख्स सादिक जमाल की मौत का, जिसे ‘लश्कर-ए-तय्यबा’ का आतंकवादी कहकर – जो कथित तौर पर मोदी, तोगड़िया और आडवाणी को मारने के लिए पहुंचा था – गुजरात पुलिस द्वारा फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया था। जांच में पता चला कि सादिक के हाथों से जो पिस्तौल बरामद दिखाई गई थी वह .32 बोर की थी, जबकि इस पिस्तौल से कथित तौर पर जो गोलियां पुलिस पर चलाई गई थीं वे .38 बोर के पिस्तौल से निकली गोलियां थीं। सादिक के शरीर पर यातना दिए जाने के निशान मौजूद थे, उसके शरीर पर कुछ घाव भी बने थे जिन्हें बिना इलाज के छोड़ा गया था।
          यह जानी हुई बात है कि बंजारा एवं उसके सहयोगी 31 अन्य पुलिस अफसर उन 15 फर्जी मुठभेड़ों के चलते जेल की सलाखों के पीछे हैं, जिन्हें गुजरात पुलिस ने 2004 से 2007 के दरम्यान अंजाम दिया। गौरतलब है कि इन्हें अंजाम देने का तरीका एक जैसा ही था, फिर चाहे इशरत जहां एवं उसके साथ मारे गए तीन अन्य लोगों की हत्या हो; सोहराबुद्दीन शेख की हत्या हो या फिर सादिक जमाल मेहतर की हत्या। यह सभी मुठभेड़ें  रात के वक्त हुईं और ‘आतंकियों’ के तमाम ‘आधुनिक ऑटोमेटिक हथियारों से लैस होने’ के बावजूद (जैसा कि बाद में बताया गया) पुलिस बल को खरोंच तक नहीं आई। ऐसी हर मुठभेड़ के बाद यही बताया गया कि यह लोग जनाब मोदी एवं उनके सहयोगियों को खत्म करने के लिए आए थे।
         पिछले साल बंजारा ने जेल से ही इस्तीफे की घोषणा करते हुए एक पत्र जारी किया था। अपने दस पेज के इस्तीफे के पत्र में जनाब बंजारा ने कई महत्त्वपूर्ण बातें कहीं थीं। कहीं भी वह इन हत्याओं पर पश्चात्ताप प्रकट नहीं करते, बल्कि यकीं करते हैं कि इन्हीं के चलते गुजरात में बाद में आतंकी हमले नहीं हुए। उनके मुताबिक ‘गुजरात के विकास मॉडल’ की कामयाबी ‘वे और उनके अफसरों की कुर्बानी पर ही टिकी है।‘
          इस अभूतपूर्व परिस्थिति पर अपनी राय प्रकट करते हुए कि उनके सहयोगी 31 अन्य पुलिस अधिकारी जेल की सलाखों के पीछे हैं, जिनमें से कई आईपीएस रैंक के भी हैं, वह बताते हैं कि 2002 से 2007 के दरम्यान वे या उनके जैसे अधिकारियों ने ‘सरकार की सचेत नीति के अनुरूप ही काम किया’ और इसके बावजूद उनके राजनीतिक आंकाओं ने उनके साथ विश्वासघात किया। पत्र में नरेंद्र मोदी एवं अमित शाह – जो गृहराज्यमंत्री रह चुके हैं – को निशाना बनाया गया है। इसमें भले ही अमित शाह पर अधिक गुस्सा प्रकट होता दिखता है, मगर मोदी को लेकर भी उसमें कोई मुगालता नहीं है। कभी मोदी को ‘खुदा’ समझने वाले बंजारा उन पर खुलकर हमला करते हुए कहते हैं कि ‘वे दिल्ली की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।‘ जेल में बंद उन पुलिस अधिकारियों के बारे में बिना सोचे, जो उनके आदेशों का ही पालन कर रहे थे।
          सोहराबुद्दीन, तुलसीराम, सादिक जमाल और इशरत जहां मुठभेड़ मामलों की जांच में मुब्तिला सीबीआई जांच अधिकारियों को चाहिए कि वह उन नीति-निर्माताओं को भी गिरफ्तार करें, जिनकी सचेत नीति को हम अधिकारी अमल में ला रहे थे… मेरा साफ मानना है कि इस सरकार की जगह गांधीनगर में होने के बजाय तलोजा सेंट्रल जेल या साबरमती सेंट्रल जेल में होनी चाहिए।
          इसमें कोई दोराय नहीं कि इस पत्र के अचानक नमूदार होने से मोदी एवं अमित शाह दोनों ही बचावात्मक पैंतरा अख्तियार करने के लिए मजबूर हैं। अपनी तुरंत प्रतिक्रिया में सीबीआई ने भले ही कहा हो कि इस इस्तीफे का ‘राजनीतिक मूल्य’ है, मगर उसने इस बात पर गौर नहीं किया है कि बंजारा का बयान अभियोजन पक्ष को और मजबूत बना सकता है। इस पत्र की कॉपी सीबीआई को भी भेजी गई है और वह चाहेगी तो पत्र में किए गए आरोपों को लेकर स्पष्टीकरण के लिए वह बंजारा को बुला सकती है, ताकि यह जाना जा सके कि आखिर हुकूमत में बैठे लोग किस तरह इन मुठभेड़ों में ‘शामिल’ थे। एक क्षेपक के तौर पर यहां यह बताया जा सकता है कि कुछ समय पहले जब इशरत जहां का मामला सुर्खियों में था, तब सीबीआई ने बताया था कि उसके पास एक अभियुक्त पुलिस अधिकारी का बयान मौजूद है, जिसमें टेप पर यह दावा किया गया है कि  बंजारा ने उन्हें बताया था कि मामले की जानकारी सफेद दाढ़ी (संकेत मोदी की तरफ) और काली दाढ़ी (संकेत अमित शाह) को दी गई है।
          यह 90 के दशक के मध्य में महाराष्ट्र में कायम शिवसेना-भाजपा हुकूमत का किस्सा है, जब पुलिस ने एक ‘पाकिस्तानी एजेंट’ को पकड़कर मीडिया के सामने पेश किया था और यह दावा भी किया था कि उपरोक्त व्यक्ति बाल ठाकरे की हत्या करने के लिए आया था। यह जुदा बात है कि इसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद ‘एशियन एज’ के एक पत्रकार को यह बात याद रही कि इसी शख्स को कुछ ही दिन पहले ठाणे की स्थानीय अदालत में हत्या के एक मामले में अभियुक्त के तौर पर पेश किया गया था। अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए उसने पुलिस प्रवक्ता से इस संबंध में कुछ प्रश्न भी पूछे। लाजिम था कि प्रवक्ता हक्का-बक्का रह गया था। बाद में इस मामले को गुपचुप दफना दिया गया और जनतंत्र का प्रहरी होने का दावा करने वाले मीडिया ने भी इस मसले पर खामोशी बरकरार रखी।
                                                                                                        समयांतर से साभार

Friday, October 10, 2014

नोबेल शांति विजेता कैलाश सत्यार्थी का इंटरव्यू

साल 2012 में प्रभात खबर के बचपन बचाओ कॉलम के लिए कैलाश सत्यार्थी से एक छोटी सी बात की थी। कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफजई को नोबेल शांति पुरस्कार दिये जाने की घोषणा के साथ ही उन्हें ढेरों मुबारकबाद देते हुए उनका इंटरव्यू साझा कर रहा हूं।

हमारे वर्तमान समाज में बच्चों के प्रति मां-बाप का रवैया असहिष्णु होता जा रहा है. अभिभावकों में मित्रभाव का अभाव बच्चों को उनसे दूर ही नहीं, उनका बचपन छीन रहा है. हालांकि इसके समाजार्थिक कारण ये हैं कि मध्यवर्गीय तबके में एकल परिवारों का चलन बढ़ा है, जिससे बच्चे एकाकीपन के शिकार होकर हिंसा की ओर बढ़ने लगे हैं. स्कूल से आने के बाद वे घर में अकेले होते हैं तो सिर्फ टीवी देखते हैं या फिर विडियोगेम खेलते हैं. यह सिर्फ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया में इस पर बहस जारी है. आज अमेरिका, नीदरलैंड, आॅस्ट्रेलिया जैसे विकसित देश भी इस बात से बेहद चिंतित हैं कि उनके बच्चे क्यों बड़ों जैसे व्यवहार कर रहे हैं. और क्यों वे छोटी सी उम्र में ही इतने हिंसक हो रहे हैं. मसला यह है कि एकाकीपन बढ़ने से बच्चों में संवादहीनता बढ़ रही है. बच्चों के न बोल पाने से उनके साथ हुई हिंसा को भी वे किसी से शेयर नहीं कर सकते. यही उनके मन में कहीं घर की हुई रहती है जो एक वक्त आने पर बाहर आ जाती है. ऐसे में बचपन बचाने की मुहिम के मद्देनजर पूरी दुनिया ने जो महसूस किया है वह है बुजुर्गों की हमारे घरों में मौजूदगी की जरूरत.
आप गौर करेंगे तो पायेंगे कि भारत के मध्यवर्ग में ज्यादातर एकल परिवार हैं. वे अपने बुजुर्गों को गांव या पुश्तैनी जगहों पर छोड़ देते हैं और घर में एक नौकर रख लेते हैं. वह नौकर, लड़का हो या लड़की, जो आर्थिक तंगी का शिकार होता है, उसके साथ बच्चा अपनी बात कैसे शेयर कर सकता है. इसलिए जरूरी है कि हम अपने बुजुर्गों की ओर लौटें. किसी भी घर के लिए बुजुर्गों का साथ बच्चों को मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक सुरक्षा दे सकता है. इसे हमें बहुत गौर से सोचने की जरूरत है. और कोई चारा नहीं है जिससे हम अपने बच्चों का मासूम बचपन संभाल सकें. क्योंकि बच्चे और बूढ़े दोनों की संवेदनाएं कहीं न कहीं मिलती हैं, जो उन्हें एक दूसरे की संवेदनाओं को शेयर करने में मदद करती हैं. बुजुर्ग अच्छी चीज को अपनाने और बुरी चीज को नकारने की सलाह देते हैं.

Tuesday, September 16, 2014

शुद्ध हिंदी

हमने हिंदी के कट्टर समर्थकों की बात अंतत: मान ली
अगले दिन से ही अंग्रेजी और उर्दू के शब्दों का
हिंदी में घालमेल न करने की ठान ली

सुबह उठते ही मैंने
नेत्र स्थित, नासिका चिपटित, द्विकर्णधारित, 
नेत्र दोष निवारक पारदर्शक यंत्र अर्थात्
चश्मा अपनी आंखों पर लगाया
तत्पश्चात दंत स्वच्छकारक दंडिका तथा
श्वेत नील धारी धारक दंत लेप से
अपनी दंतावली को स्वच्छ किया एवं चमकाया
एक कप चाय के लिए पत्नी को शयन कक्ष में बुलाया- 
‘‘हे प्रिये, एक पक्व मृतिका के पात्र में 
शर्करा युक्त, दुग्ध मिश्रित, पर्वतीय पत्तियों का 
अति उष्म पेय पदार्थ प्रेषित कर दो मेरी रानी’’
पत्नी बोली- ‘‘सुबह-सुबह शुरू हो गये, ये नयी कविता है या कहानी’’

शुद्ध हिंदी बोलने की सौगंध ले रखी थी
इसलिए कुछ काम ध्वनि द्वारा तो कुछ संकेतों में निपटाया
घर से निकलकर दिल्ली जाने वाली बस में आया
और कंडक्टर से कहा, ‘‘हे संवाहक महोदय, 
इंद्रप्रस्थ नगरी प्रस्थान करने हेतु समुचित मूल्य का
एक वैधानिक यात्रापत्र हमें तुरंत सुलभ करवाइए’’
कंडक्टर ठेठ हरियाणवी था, सीटी बजाकर ड्राइवर से बोला-
‘‘गलत रूट की सवारी है, ब्रेक मारकर उतार दो’’
हमने कहा- ‘‘महोदय, वाहन मत रोकिए, 
जहां आप कह रहे हैं, हमें वहीं है जाना’’
कंडक्टर बोला- ‘‘तू आगरे क्यों नहीं चला जाता,
वहीं है मशहूर पागलखाना’’

हमारे पड़ोसी यात्री ने सिगरेट सुलगाकर एक गहरा कश लगाया
हमने तत्काल शोर मचाया- 
‘‘हे संवाहक महोदय, यह व्यक्ति
श्वेत धूम्रदंडिका का अनाधिकृत दहन करके
इसका अवांछित धूम्र हमारी नासिका पर प्रक्षेपित कर रहा है
इसके मस्तिष्क में न चिंतन है, न मनन है
यह परिवहन नियमावली के विरुद्ध
हमारे मौलिक अधिकारों का साक्षात हनन है
मेरा निकटस्थ यात्री, पर्यावरण प्रदूषित समस्त कर रहा है
संविधान के मूल ढांचे को ध्वस्त कर रहा है’’
कंडक्टर बोला- ‘‘बैठ जा बैठ जा, 
इसने कौण सी गौरी मिसाइल की पूंछ में आग लगा दी
एक सिगरेट ही तो सुलगाई है
इतना शोर तो अमेरिकन टावरां के गिरने पर भी नहीं मच्या
जितनी हाय-तौबा तूने इस धूएं पर मचाई है’’

दिल्ली पहुंचकर हमने एक रिक्शे वाले को
जिलाधिकार समीप स्थित सामुदायिक केंद्र चलने को कहा
वह दो-चार लोगों से पूछने के बाद हमसे सीधा टकराया
‘‘तुम्हें कम्युनिटी सेंटर जाना है, तो सीधे-सीधे भी तो बता सकते थे
अंग्रेजी बोलनी जरूरी थी, हिंदी में भी तो बता सकते थे’’

नोट : यदि हिंदी की भागीरथी को आप समुद्र नहीं बना सकते, तो इसे संकुचित करके छोटा नाला मत बनाइए. इसमें उर्दू और संस्कृत की यमुना और अलकनंदा को मिलने दीजिए. अंग्रेजी जैसे छोटे झरनों पर भी बांध मत बनाइए. क्योंकि सैकड़ों नालों और नदियों के मिलने के बाद ही भागीरथी पवित्र गंगा बन पायी है. हमने दूसरी भाषाओं के शब्दनदों को हिंदी की हदों में आने से रोका है. इसलिए हिंदी आज तक हिंदी रही है. जन-जन की पवित्र हिंदुस्तानी गंगा नहीं बन पायी है.

Wednesday, September 10, 2014

आलू-प्याज़ की बोरी हैं लड़कियां

सही कहा तुमने
अब कोई जोधाबाई
किसी अकबर के घर नहीं जायेगी
और न फिर से
कोई दीन-ए-इलाही पैदा होगा
जहां धर्मों से ऊपर होता है एक इंसान।

मगर मेरे दोस्त, तुम यह भूल गये
के फिर कोई हुमायूं
किसी कर्मावती की हिफाज़त की
कसम नहीं खायेगा कोई
और न फिर कहीं किसी
रक्षाबंधन की बुनियाद ही पड़ेगी...
सही कहा कि अब कोई जोधाबाई
किसी अकबर के घर नहीं जायेगी।

सिकंदर अपनी बेटी तुम्हें दे जायेगा या नहीं
यह तो मुझे नहीं मालूम
पर इतना जरूर मालूम है कि तुम्हारी बेटियां
भले ही आसाराम जैसों की शिकार हो जायें
उन्हें उस राक्षस के पास भेजने में
तुम्हें कोई ऐतराज़ नहीं होगा
क्योंकि वह नुमाइंदा है तुम्हारे धर्म का।

बलत्कृत हो रही हैं
तो होती रहें ये लड़कियां
तुम्हारे मंदिर-ओ-मस्जिद तो सलामत हैं!
खुदकुशी कर रही हैं, तो करती रहें
तुम्हारे दीन-ओ-धरम तो सालिम हैं!
तुम्हारे खुद के हाथों
अगर वो मर रही हैं, तो मरती रहें
तुम्हारे किताबों पर तो कोई आंच नहीं!
उनके मरने, लुट जाने से
तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़नेवाला
क्योंकि यह तुम्हारे धर्म का मामला नहीं है।

दरअसल, ग़लती तुम्हारी नहीं है
क्योंकि, तुम्हारी धर्म की ठेकेदारी
औरत की इज्ज़त पर ही टिकी है
तुम्हारे लिए औरतें और लड़कियां
महज आलू-प्याज़ की ऐसी बोरियां हैं
जिन्हें तुम अपने मन-भाव में
धर्म-जाति, शरिया-गोत्र की मंडियों में
बेझिझक बेच सकते हो
जो चाहे, क़ीमत लगा सकते हो उनकी
और इसी क़ीमत से तुम
पुरुष सत्ता के भुरभुरे खंभों को
मज़बूत बनाते रहने की
नाकाम कोशिशें करते रहते हो।

कितने ओछे और कमज़ोर हैं तुम्हारे धर्म
जो मासूम प्रेम की चुनौती भी स्वीकार नहीं कर पाते
और गिरने लगते हैं भरभराकर
तुम इसमें दब के मर न जाओ
इसलिए औरत का सहारा लेते हो
कितनी कमज़र्फ है तुम्हारी मर्दानगी
जिसकी इज्ज़त की हिफाज़त भी नहीं कर सकती
उसी के सहारे
तुम अपने धर्मों की ठेकेदारी करते हो।

बिल्कुल सही कहते हो तुम मेरे दोस्त
अब कोई जोधाबाई
किसी अकबर के घर नहीं जायेगी...

Thursday, July 10, 2014

हमारी दिल्ली।

अंधेरे में डूबी हमारी ये दिल्ली।
अच्छे दिनों की है मारी ये दिल्ली।।
शतरंज के काले खानों में बैठे।
सेवेन रेसकोर्स की दुलारी ये दिल्ली।।
Power Cut in Delhi
काले रुपइये पर गंदी सियासत।
है नेताओं की दीनदारी ये दिल्ली।।
ग़ालिब की गलियों की अफ़सुर्दा रातें।
लूटियन इलाकों पे वारी ये दिल्ली।।
कहां शौक के कोई खुशियां समेटे।
बलात्कार की बेक़रारी ये दिल्ली।।
पहले मुहब्बत सिखाती है लेकिन।
है एहसास की कारोबारी ये दिल्ली।।
बेदिल की दिल्ली है, दिल्ली है बेदिल।
ज़ख़्मी तिजारत की प्यारी ये दिल्ली।।


Gali Qasim Jaan, Delhi

Tuesday, May 27, 2014

चम्मचों में बंटे वामपंथ को कड़ाही बनना होगा

Atul Kumar Anjan and Wasim Akram
सोलहवीं लोकसभा के लिए हुए आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की ऐतिहासिक जीत के साथ ही कई छोटी पार्टियों की बुरी हार हुई है। वामपंथी पार्टियां भी उनमें शामिल हैं। वाम मोरचे के गिरते हुए जनाधार को देखते हुए ऐसा माना जा रहा है कि वामपंथ अब ​हाशिये पर चला जायेगा। वामपंथी आंदोलन भारतीय राजनीति की एक महत्वपूर्ण धारा है, लेकिन पिछले कुछ समय से वामपंथी पार्टियां चुनावी अखाड़े में लगातार हाशिये पर जा रही हैं और उनके जन-संगठन भी कमजोर होते जा रहे हैं। इस बार के लोकसभा चुनावों में एक ओर जहां दक्षिणपंथी भाजपा व उसके सहयोगी दलों को भारी जीत हासिल हुई है, वहीं वाम मोरचे को गिनती की सीटें मिली हैं। वामपंथी राजनीति के वर्तमान और भविष्य के विभिन्न पहलुओं पर हमने अपने छात्र-जीवन से ही वामपंथी राजनीति में सक्रिय, वर्तमान में कम्यूनिस्ट पार्टी आॅफ इंडिया (सीपीआइ) के राष्ट्रीय सचिव, अखिल भारतीय किसान सभा के महासचिव और एक तेज-तर्रार एवं मुखर राजनेता कॉमरेड अतुल कुमार अंजान से प्रभात खबर के लिए बात की...


1-  भाजपा की अप्रत्याशित जीत और कांग्रेस की ऐतिहासिक हार के साथ इस चुनाव में वामपंथी दलों को भी भारी हार हुई है. गरीब-किसानों की पार्टी कहे जानेवाले वाम के जनाधार कम होने के क्या कारण हैं, जबकि देश में अब भी गरीबों की ही ज्यादा संख्या है?
          हमारी पार्टी गरीब-किसानों की पार्टी है, मजदूर और हाशिये पर पड़े लोगों की पार्टी है, अल्पसंख्यकों की पार्टी है, लेकिन अब सिर्फ गरीब-गरीब कहने से ही काम नहीं चलनेवाला है. अब जरूरत है उनके भावनाओं के साथ जुड़ने की. उनके अंदर जो परिवर्तन हो रहा है, उस परिवर्तन को अगर बारीकी से हम नहीं देखेंगे, और उस आधार पर कोई ठोस रणनीति नहीं बनायेंगे, तो वे सिर्फ हमारे नाम के लिए थोड़े हमें वोट देने जायेंगे. डायनॉमिजम और डायनॉमिक्स दोनों अलग-अलग चीजें हैं. हमारे यहां जो डायनॉमिक्स में बदलाव आ रहा है, उसके लिए एक नये डायनॉमिजम की जरूरत है.

2-  तो किस तरह का होना चाहिए वह डायनॉमिजम?

         मोर कनेक्ट टू मोर प्यूपिल... यानी गरीबों-किसानों के साथ परस्पर जुड़ाव जरूरी है. उनके साथ सहभागिता और उनके मुद्दों पर गहरी विवेचना करने की जरूरत है. वर्षों से चली आ रही पार्टी की रस्म अदायगी को छोड़ कर उनके एहसास में रच-बस जाने का दौर है. और सबसे ज्यादा जरूरी है दीर्घकालिक संघर्ष चलाना.

3-  लेकिन ये सब तो इस चुनाव में होने चाहिए थे. तो आखिर क्यों नहीं किया आपने और आपकी पार्टी ने?

        सब हो रहा था, लेकिन उसका इतना असर नहीं पड़ा. अब क्या कीजियेगा! हम लोग मूर्ख नहीं हैं. हमने पूरे आठ साल से संघर्षरत होकर पॉस्को को रोका हुआ है. ये बात और है कि इस चुनाव में उस संघर्ष का प्रतिफलन नहीं हुआ. क्योंकि संघर्ष एक अलग चीज है और चुनाव एक दूसरी चीज है. यह भी अब एक नयी परिभाषा आ गयी है. चुनाव के लिए संघर्ष आपका एक आधार बन सकता है, लेकिन चुनाव में अब जाति, धर्म और संकीर्णताओं की मूख्य भूमिका होने लगी है. धन की भूमिका तो है. अब इन तीनों से हम कैसे निपटें? इन तीनों का कम्यूनिस्ट पार्टी का कोई लेना-देना नहीं है. जिस दिन हम इन तीनों के साथ जुड़ जायेंगे, उस दिन हम कम्यूनिस्ट पार्टी नहीं रह जायेंगे.

4-   भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला है. माना जा रहा है कि देश ने ऐसा जनादेश विकास के वायदों पर दिया है. अगर उन वायदों को पूरा करने में कोई कोर-कसर होगी, तो क्या भाजपा की इस प्रचंड विजय के बाद भारत की राजनीति गैरकांग्रेसवाद से अब गैरभाजपावाद की ओर रुख करेगी?

          इस मामले में कुछ चीजें बहुत महत्वपूर्ण है. उनमें से एक है देश में बदलाव की भावना. कांग्रेस कहती है कि उसने अच्छी-अच्छी नीतियां बनायी, लेकिन वह देश को बता नहीं पायी. तो सवाल है कि आपको किसने कहा था कि आप जनता को मत बताइये. आप कनेक्ट नहीं हो पाये, क्योंकि आप कलेक्ट करते रहे. जनता से कनेक्ट होना आपकी प्राथमिकता में थी ही नहीं. आप सिर्फ मलाइदार तबकों और देश के कॉरपोरेट घरानों से कलेक्ट करने में लगे थे. तो जब आप माल कलेक्ट कर रहे थे, तो हम जनता से कनेक्ट कैसे होते? कारण, आपने गैस, डीजल, तेल आदि के दाम बढ़ा दिये. आपने डाई के दाम 260 रुपये से बढ़ाके 1200 रुपये कर दिया, इसका क्या औचित्य है? देश के किसानों को तो कांग्रेस ने अपने खिलाफ कर दिया. चलते-चलते यूरिया के दाम भी 28 सौ रुपये टन कर दिये. एक साल में साढ़े आठ रुपये डीजल के दाम बढ़ाये. अब यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि किसान-मजदूर आपके साथ खड़े होंगे. आप लगातार ऐसे-ऐसे समझौते कर रहे हैं, जिससे विदेशी सामान हमारे बाजारों पर कब्जा करते जा रहे हैं. आज हिंदुस्तान के हर घर में चाइनीज उत्पाद मिलते हैं. अगर आज चीनी टॉर्च न हो तो गांव के लोग ठीक से खाना भी न खा पायें, क्योंकि गांव में बिजली मिलती नहीं और शहरों में भी गायब रहती है. राधा जी को कृष्ण जी पिचकारी से रंग डाल रहे हैं, यह भी चीन से बन के आ गया. मक्का-मदीन के पोस्टर चीन से आने लगे. शिवलिंग भी चीन के ही बिक रहे हैं. दीवाली पर अब कोई मिट्टी का दिया नहीं जलाता, बल्कि 20-30 रुपये में इलेक्ट्रॉनिक दिये की लड़ी मिल जाती है. कांग्रेस ने जो 312 नयी फ्री ट्रेड समझौते किये हैं, जो 2014-15 से लागू होंगे, जिसके तहत विदेशों से कटी-कटाई सब्जियां आयेंगी, फल आयेंगे आदि, तो क्या इससे लोग कनेक्ट हो पायेंगे. पूरा का पूरा देश का लघुउद्योग खत्म हो गया और इस मामले में यानी आर्थिक नीति के मामले में भाजपा-कांग्रेस दोनों एक जैसी ही हैं. इन दोनों में कोई फर्क नहीं है, क्योंकि आज से छह साल पहले आडवानी जी ने कहा था कि भाजपा की आर्थिक नीतियों को कांग्रेस ने चुरा लिया है. आर्थिक मामलों में इन दोनों पार्टियों के प्रेरणास्रोत विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और एशियन डेवलपमेंट बैंक हैं. अमेरिका का मोदी को वीजा देने न देने का नारा दिखावटी है और मोदी भी दिल से भले हिंदुस्तानी हैं, लेकिन मन से अमेरिकी हैं. फिर भी अभी मैं यह नहीं कहूंगा कि देश की राजनीति अब गैरभाजपावाद की ओर रुख करेगी कि नहीं, क्योंकि अभी यह देखना बाकी है. लेकिन, इतना जरूर कहूंगा कि---
उसकी बातों पे न जा कि वो क्या कहता है।
उसके पैरों की तरफ देख वो किधर जाता है।।

5-   नरेंद्र मोदी देश के विकास को आंदोलन का रूप देने की बात कहते हैं. क्या लगता है आपको?

        उनके भाषण बहुत अच्छे होते हैं, जो ठीक ही है, और उनका हाव-भाव भी बहुत ही अच्छा होता है, लेकिन उनका भाषण इल्मी कम और फिल्मी ज्यादा लगता है. क्योंकि अगर इल्मी होता तो तक्षशिला को पटना के तट पर न पहुंचा देते. बहरहाल मैं ज्यादा कुछ न कह कर इतना ही कहूंगा कि अभी उन्हें सरकार चलाना तो शुरू करने दीजिए. आगे देखेंगे कि क्या कहा जा सकता है. लेकिन आजकल ड्रामा बहुत हो रहा है. कहा जा रहा है कि तीस साल के बाद पहली बार भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला है. आखिर क्यों? ऐसा कहना क्या अटल विहारी बाजपेयी की लिगेसी को किनारे करना नहीं है? आपको यह कहना चाहिए कि यद्यपि हम पूर्ण बहुमत के साथ पहली बार आये हैं, लेकिन इसके पहले हम अटल जी के नेतृत्व में पहले गठबंधन के साथ बहुमत में आ चुके हैं. ऐसा कहना आपकी राजनीतिक ईमानदारी का यथार्थ प्रस्तुतिकरण होता. तीस साल बाद आने की बात कहने का अर्थ है कि आप अपनी आत्मश्लाघा में, खुद को महिमामंडित करने में उन तमाम लोगों की जड़ों को खोद रहे हैं, जिनके सहारे आप चढ़े थे, चाहे केशूभाई पटेल हों या अटल बिहारी वाजपेयी हों.

6-   इस हार के बड़े सबक वामपंथी दलों के लिए क्या हैं. बंगाल में लगातार सिकुड़ता जनाधार जबकि केरल और त्रिपुरा में बरकरार, ऐसा क्यों है?

        यही बहस 2004 में भी चली थी कि वाम मोरचे को लोकसभा में 63 सीट कैसे मिल गयी. जब हम जीत जाते हैं, तो ज्यादा गुदगुदी नहीं होती, लेकिन जब हम हार जाते हैं, तो भारत के वामपंथ विरोधी लोग, ज्यादा सुंदर तरीके से नृत्य पेश करते हैं. कॉरपोरेट घराने के लोग, संघ के लोग, संकीर्ण सांप्रदायिक लोग, साम्राज्यवाद की वकालत करनेवाले उनके अवधूत लंगोटा बांध कर हमको गाली देने के लिए अखाड़े में उतर आते हैं. वही स्थिति अभी फिर होनेवाली है.

7-   ऐसे में वामपंथी राजनीति की अब क्या संभावनाएं हैं. लोग कहते हैं कि यह सिर्फ विचारों की ही पार्टी है और अब यह लंबे समय के लिए हाशिये पर चली जायेगी. आप क्या सोचते हैं?

        लड़ाई होगी, फिर से हम लड़ेंगे. लड़ते रहे हैं और लड़ते रहेंगे. वामपंथ को इतना कमजोर मत समझिए. हम सिर्फ विचारों की ही पार्टी नहीं हैं, बल्कि आचार-विचार दोनों की पार्टी हैं. अगर सिर्फ विचारों की पार्टी होती तो आज भी 12-14 सीटें कैसे मिलतीं और कई जगहों पर हमारा वोट शेयर कैसे बढ़ता? अभी हम केरल में हैं, त्रिपुरा में हैं. जब-जब पूंजीवाद चरम पर पहुंचेगा, वाम मोरचा उभरेगा और लोकतंत्र की सच्ची लड़ाई लड़ेगा. वामपंथ कभी हाशिये पर नहीं जा सकता. वामपंथ को हाशिये पर भेजने की बात करनेवाले आम चेयर पॉलिटिशयन हैं, जो वामपंथ के साथ सिर्फ अपना सरोकार दिखाते हैं और कहते हैं कि- ‘आइ सिम्पैथाइज विथ लेफ्ट, बट...’ इनके लिए अकबर इलाहाबादी का एक शेर है- लीडर को रंज तो बहुत है मगर आराम के साथ। कौम के गम में डिनर लेते हैं वो काम के साथ।। ये ऐसे वामपंथी हैं, जो कमरे के अंदर से बाहर निकलना भी नहीं चाहते, जिनको पड़ोसी भी नहीं जानते कि इनका विचार वामपंथी है कि नहीं. लेकिन भरी सभाओं में इनके चित्कार को सुन कर लगता है कि ये वाम के नये अवतार हैं. वाम को सबसे ज्यादा इन्हीं से खतरा है. वाम को इनसे भी बचना होगा और इनमें से सही तथ्यों को निकालकर संघर्षों में लाठी डंडे खाने के लिए घसीटना होगा, ताकि ये बौद्धिकी समाजवाद से लेकर के प्रायोगिक समाजवाद में आ जायें.

8-   क्या किन्हीं परिस्थितियों में भाजपा-विरोध के आधार पर गैर-भाजपा राजनीतिक दलों के किसी बड़े गंठबंधन की संभावना बन सकती है?

        हमारे लिए कोई भाजपा विरोध नहीं है. हम नेताओं का विरोध नहीं करते. अगर हम ऐसा करते तो राम विलास पासवान को कभी बगल में नहीं बैठने देते. हम नीतियों के आधार पर विरोध करते हैं. कल तक वे कहते थे कि मेरी सबसे बड़ी गलती थी कि मैं एनडीए की सरकार में चला गया, लेकिन आज फिर उसी गोद में दोबारा बैठ गये. रामविलास पासवान वह निर्मल जल हैं, जो हर बरतन में ढल जाते हैं. मैं इसको इसलिए कह रहा हूं कि जब वे राजनीतिक वनवास में थे, तो कम्यूनिस्ट पार्टी की बदौलत ही आप राज्यसभा में आये. यह देखने की जरूरत है कि जो दलित राजनीति कर रहे थे और हाशिये पर पड़े दलितों की चर्चा करते हुए कहते थे कि मनुवाद ने उन्हें बरबाद किया है, वे सभी आज कहां पहुंच गये? सब के सब मनुवाद की पार्टी में पहुंच गये. अब इन्हें मनुवाद नहीं, बल्कि मनुहारवाद दिखायी दे रहा है. इनका बस एक ही नारा है- रीजन इज राइट, फ्यूचर इज ब्राइट. इसलिए इनके लिए कभी वीपी सिंह सही थे, तो आज नरेंद्र मोदी सही हैं. ये सभी आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में जनवाद ढूंढ रहे हैं. और इसमें वे सफल भी हो गये हैं, क्योंकि इनका व्यक्तिवाद जो है, वही देश का जनवाद है. इनका विकास ही देश का विकास है. इनकी करोड़ों की हैसियत बढ़ती है, तो दलित समाज की हैसियत बढ़ती है, भले ही दलित हाशिये पर पड़े रहें. रामविलास पासवान जी जब रेल मंत्री थे, तब सभी रेलवे स्टेशन पर से नि:शुल्क पानी की टंकी बंद करा कर और सबके हाथ में 12 रुपये की कॉरपोरेटी बोतल पकड़ा दी. ये दलितवाद के साथ-साथ बहुत बड़े पूंजीवाद के समर्थक हैं.

9-   इस जनादेश के बाद कई क्षेत्रीय पार्टियों का सफाया हो गया. तो क्या इनका अस्तित्व अब खतरे में है? क्योंकि कई नेता कहते रहे हैं कि क्षेत्रीय दलों को लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ना चाहिए, इससे स्थायी सरकार बनाने में बाधा होती है?

        मैं नहीं मानता कि छोटी और क्षेत्रीय पार्टियों का अस्तित्व इतना जल्दी खत्म हो जायेगा. क्योंकि छोटी पार्टियां ‘इब्नुल वक्त’ (हवा का रुख पहचाननेवाला) की तरह हैं. एनडीए में शामिल दो दर्जन दल इसकी मिसाल हैं. दूसरी ओर, आज भी प्रतिरोध की शक्तियां अपने वैचारिक प्रतिरोध के आधार पर खड़ी हुई हैं. वे सभी उभरेंगी और जल्द ही उभरेंगी. ज्यों-ज्यों जनता के ऊपर कठिनाइयों का बोझ बढ़ेगा, त्यों-त्यों वे आंदोलन का स्वरूप अख्तियार करेंगी. जब-जब अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी की चोट बढ़ेगी, जितनी ही महंगाई का दंश झेलना पड़ेगा, जितना ही बेरोजगारी की समस्या का जबरदस्त छलांग उठेगा, और तब देश के अंदर दो तरह की शक्तियों का उदय दिखायी देगा कि- 125 करोड़ के देश में 25 करोड़ एक तरफ और 100 करोड़ एक तरफ होंगे. यानी हाशिये पर पड़े 100 करोड़ लोग और खाये-अघाये 25 करोड़ लोग. इन सब के बीच सच तो यह है कि वामपंथ ही उभार लेगा, जो लोकतंत्र का मोरचा संभालेगा. लेकिन आज और अभी से ही वामपंथ को एक नये तरीके से सोचना होगा कि कैसे वह इस परिस्थिति से निपटे. हमें एक पंच लाइन लेकर चलना होगा कि आजादी के बाद से जितनी भी नीतियां बनीं, सबके जरिये आज तक जनता में सिर्फ दुखों का बंटवारा हुआ, लेकिन अब यह जनता को ठानना होगा कि आइए हम सब संघर्ष करें, ताकि हमारे बीच सुखों का बंटवारा हो सके.

10-   तीसरे मोरचे के बारे में आपकी क्या राय है?

       इस शब्द जैसा कोई तत्व नहीं है. तीसरा मोरचा कोई सांप-बिच्छुओं का मेल नहीं हो सकता. वह तीसरा मोरचा हो ही नहीं सकता, जिसका कोई वैचारिक आधार न हो. बार-बार मुलायम सिंह कहते हैं कि तीसरे मोरचे की सरकार बनेगी. वे ऐसा क्यों कहते हैं, पता नहीं. मायावती ने कहा कि देश को दुखदायी बनाने में कांग्रेस की तरह बसपा को भी जनता ने जिम्मेवार मान लिया है. शुक्र है कि मायावती में यह ईमानदारी बड़ी देर से आयी, लेकिन मुलायम में तो इतनी भी ईमानदारी नहीं. देश मुलायम सिंह से जानना चाहता है कि समाजवाद और मसाजवाद में क्या अंतर है? आप कहते हैं कि कांग्रेस ने देश को बरबाद कर दिया और उसी कांग्रेस के साथ चिपके भी हुए हैं.

11-   समाजवाद और मसाजवाद! जरा इसे विस्तार से बतायेंगे क्या?

         एक बार 1963 में अपने भाषण में डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि कुछ लोगों ने कुछ लोगों का मसाज करना शुरू कर दिया है. कुछ नेता अपने चेलों से मसाज करवाने लगे हैं. उन्होंने यह कहा था कि समाजवाद को मसाजवाद में मत बदलो. डॉ लोहिया अपने संबोधन गांवों, कस्बों और छोटे शहरों में करते थे, लेकिन आज के समाजवादी नेता अपने संबोधन पांच सितारा होटलों में तरे हैं. पांच सितारा होटलों में पांच रुपये की चीज पचास रुपये में मिलती है और वह तो मसाज की एक बेहतरीन जगह है, जहां तमाम बड़े कॉरपोरेटी लोग और राजनीतिक लोग मसाज करते-करवाते हैं.

12-   आपने कहा कि संघर्ष और चुनाव दो अलग-अलग चीजें हैं. कॉरपोरेट के मौजूदा दौर में वाम के संघर्ष का स्वरूप क्या होगा. एक शहर के कॉलोनियों की तरह बंटने की शक्ल में आज मार्क्सवाद का क्या हाल हो गया है?

        मौजूदा दौर में चुनाव आम आदमी का नहीं, बल्कि कॉरपोरेट घरानों का चुनाव है. चुनाव-प्रचार पर, डिजिटल-प्रचार पर, सोशल मीडिया-प्रचार पर यहां तक कि स्टेज बनाने तक पर कॉरपोरेटी दखल है, जिसमें हम पिछड़ गये. हमने इन सब चीजों का इस्तेमाल ही नहीं किया. आधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने से हम विरक्त रहे. लेकिन अब यह करना पड़ेगा. अब कनेक्ट होने के लिए घर-घर जाने की जरूरत नहीं, बल्कि नयी तकनीकों का इस्तेमाल करने की जरूरत है. यह विडंबनात्मक तो लगता है, लेकिन फिर भी मैं वामपंथी नेताओं से कहना चाहता हूं कि अब अंधेरे गलियारे में टहलिये मत. ज्ञानचक्षु खोलिए और देखिए कि जमाना किस ओर जा रहा है. सभी वामपंथी धड़ों से पूछना चाहता हूं कि अंधेरे गलियारे में टहलते-टहलते हम सब कहां पहुंच गये? वाम मोरचे के परहेजवाद ने उसे टुकड़ों में बांट दिया है. मार्क्सवाद एक विस्तार दर्शन है, लेकिन हमने इसे कॉलोनियों में नहीं, बल्कि चम्मचों में बांट दिया है.

13-   तो क्या भविष्य में कोई ऐसी सूरत बनेगी, जब सारे वामपंथी दल एक साथ आ जायेंगे या चम्मचों से होते हुए कांटेदार चम्मचों में तब्दील हो जायेंगे?

        मुझे अब समझ में आता है कि अतिसंकीर्णतावाद, घनघोर साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिक उन्माद और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी जब मजबूर करेगी, तो चम्मचों में बंटे हुए तमाम वामपंथी दल इकट्ठा होकर एक बड़ी कड़ाही में तब्दील होंगे. चम्मच से इन्हें कांटेदार चम्मच नहीं, बल्कि कड़ाही बनना होगा, तभी आंदोलन का विस्तार होगा और मार्क्स के विस्तृत दर्शन को एक नया स्थान मिलेगा. गरीबों के लिए लड़ाई लड़ी जायेगी और विकल्प की राजनीति के नये रास्ते खुलेंगे. अकेले लड़ने के स्थान पर तमाम लोगों के एक साथ, तमाम धर्मों-वर्गों के लोगों के एक साथ इकट्ठा होकर लड़ाई लड़ने कोशिश होनी चाहिए. क्योंकि मार्क्सवाद का पर्याय परहेजवाद में नहीं है. कल तक 24 कैरेट का सोना खोजते-खोजते अपने हाथ में पीतल लेकर टहलने लगे हैं, यह कैसी हमारी परिणति है और यह कैसा परहेजवाद है?

14-   अन्ना आंदोलन के समय ऐसा माना जा रहा था कि अरविंद केजरीवाल ने वामपंथ के हथियार को छीन लिया है. ऐसा है क्या?

        अन्ना आंदोलन का हस्र भी तो आपको पता होगा ना. जनरल वीके सिंह को पहुंचाकर अन्ना रालेगण पहुंच गये ना. ममता बनर्जी के पास भी गये थे, लेकिन वहां से भी वापस आकर फिर रालेगांव पहुंच गये. अन्ना ने तो जर्म्स कटर का प्रचार किया. अब यह कौन जानता है कि जर्म्स कटर दाद-खाज-खुजली मिटाता है कि नहीं. किसी ने अंदर जाकर देखा थोड़ी. अन्ना को यह बात समझनी चाहिए थी. जहां तक केजरीवाल की बात है, तो उन पर कुछ कहना अभी मुनासिब नहीं है. क्योंकि उनकी पार्टी के एक बड़बोले नेता ने कहा कि हमारी कोई धारा नहीं है- न हम सेंटर हैं, न लेफ्ट हैं और न राइट हैं. यानी वे अभी अंतरिक्ष में घूम रहे हैं.

15-  अब तो नरेंद्र मोदी जी हमारे देश के प्रधानमंत्री बन गये हैं. चुनाव-प्रचार के दौरान अपने भाषणों से उन्होंने जो लहर बनायी, उससे क्या एक नयी राजनीति का सूत्रपात हुआ. क्या कहेंगे आप?


         पहले तो प्रधानमंत्री बनने पर उन्हें ढेरों बधाइयां. पिछले सात-आठ वर्षों में नरेंद्र मोदी ने एक कला सीखी है, जिसे हम ‘क्लास एलिनिएशन’ (वर्ग उन्मूलन) कहते हैं- यानी अपने वर्ग शत्रुओं का सफाया करना, किनारे करना या हटा देना. 2007 में फिर से मुख्यमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी जी ने इस कला के जरिये अपने विरोधियों को हटाना शुरू कर दिया था. इतनी सुंदर राजनीति कि जिन हाथों में कभी शमसीर थी, वे हाथ दया के लिए भीख मांग रहे थे. अब ऐसे में लहर तो बननी ही थी. मैं कभी नहीं कहता कि भारतीय इतिहास के शास्त्रों में शाम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. और वैसे भी राजनीति में मित्र कम, शत्रु ज्यादा होते हैं, इसलिए शाम-दाम-दंड-भेद अपनाने की जरूरत तो पड़ेगी ही. ऐसी राजनीति के लिए नरेंद्र मोदी जी को दाद तो देनी होगी और उनसे भारतीय राजनीतिक दलों को ऐसी राजनीति भी सीखनी भी होगी. उनके चातुर्य और उनके शब्दों के प्रयोग करने के तरीके पर उनकी प्रशंसा तो बनती है. लेकिन साथ ही यह भी कि निजता की नीचता और नीचता में निजता हमारी भारतीय राजनीति में उनके आने से शुरू होती है. अब आगे देखते हैं कि इस पूरे चुनावी गतिविधियों से उपजी नयी-नयी चीजों के साथ ही नयी सरकार के काम-काज का तरीका क्या होता है. इंतजार कीजिए...

Wasim Akram and Atul Kumar Anjan